ना काहू से दोस्ती ना काहू से बैर : धार्मिक आजादी


अमेरिका के वर्जिनिया में एक तीस साल पुराना चर्च अहमदाबाद के स्वामीनारायण संस्थान ने खरीदा है। यह अमेरिका का छठा तथा विश्व का नौवां चर्च है जो गिरिजाघर से मंदिर में तब्दील होने वाला है। 
सुप्रभात । आज पूरे विश्व में क्रिसमस की धूम है। क्रिसमस आजकल ऐसा त्यौहार है जो सिर्फ ईसाई धर्मानुयायी ही नहीं लगभग सभी मनाते हैं। युवा वर्ग का यह चहेता पर्व हो रखा है। लेकिन हमारे देश मे पिछले कुछ सालों से कुछ कट्टरपंथी कहे जाने वाले धर्मानुयायियों ने इसका प्रखर विरोध भी काफी किया है कि ईसाइयों के पर्व को कोई और क्यों मना रहा है।
आज हम बात करेंगे अमेरिका की। वहां अभी क्रिसमस का त्योंहार धूमधाम से चल रहा है। लेकिन वहां पर धार्मिक स्वतंत्रता शायद भारत से अधिक है जबकि वो घोषित क्रिश्चियन देश है। आप सोचोगे मैं ऐसा क्यो बोल रहा हूँ? हमारा देश संवैधानिक दृष्टि से धर्मनिरपेक्ष देश है। सर्व धर्म समभाव की यहां सनातन परंपरा है। लेकिन कट्टरपंथी कभी कभी यहां हावी हो जाता है, बस यही कारण है मेरे ऐसा लिखने का।
कल क्रिसमस की पूर्व संध्या पर अमेरिका के वर्जिनिया में एक तीस साल पुराना चर्च अहमदाबाद के स्वामीनारायण संस्थान ने खरीदा है। यह अमेरिका का छठा तथा विश्व का नौवां चर्च है जो गिरिजाघर से मंदिर में तब्दील होने वाला है।
संस्थान के महंत भागवतप्रिय दास स्वामी ने कल कहा कि  ‘चर्च को मंदिर में परिवर्तित करने में बहुत अधिक प्रयास नहीं किए गए हैं। क्योंकि वह पहले से ही एक धार्मिक स्थल था। यह वर्जिनिया में हरि भक्तों के लिए पहला मंदिर होगा।‘
शायद मेरे मन्तव्य को आप समझ गए होंगे। धर्म तथा धार्मिक मान्यताएं स्वेच्छिक ग्रहण करने वाली बातें हैं, और यह बहुत हर्ष का विषय है कि भारत से उद्भव हुआ धर्म विश्व में सहर्ष अपनाया जा रहा है। पूर्वाग्रही मानसिकता वालों से आज के दिन सिर्फ इतना ही कहूंगा कि चर्च में प्रेयर करते अपनों को ही नहीं देखें बल्कि उन विदेशियों को भी देखें जो हरिनाम की धुन पर यत्र तत्र सर्वत्र आपको झूमते दिख जाएंगे। तब आपको लगेगा कि हर धार्मिक मान्यता आज के संसार में स्वेच्छिक हो चुकी है तथा इसे मध्यकालीन युग के समान किसी पर जबरदस्ती नहीं थोपा जा सकता, हाँ प्रलोभन द्वारा अगर कुछ उलट फेर होता भी है तो वो स्थायी नहीं होता।
आज अटलजी का भी जन्मदिन है उनकी एक कविता की पंक्तियों से अपनी बात समाप्त करता हूँ।
कुछ कांटों से सज्जित जीवन,
प्रखर प्यार से वंचित यौवन,
नीरवता से मुखरित मधुबन,
परहित अर्पित अपना तन-मन,
जीवन को शत-शत आहुति में,
जलना होगा, गलना होगा,
कदम मिलाकर चलना होगा।
हम सबको समान आदर देते हुए हमारे पथ पर निरन्तर चलते रहें ।
सर्व आश्रयदात्री भारतमाता की अनन्त जयजयकार