बदलते दौर में रिश्तों की अहमियत


हमारे भारत मे परिवार की महत्ता बहुत अधिक है।
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हमारे भारत मे परिवार की महत्ता बहुत अधिक है। विश्व भर में जहाँ वयस्क होते ही बच्चे माता पिता से दूर हो जाते है वही भारतीय उपमहाद्वीप में कई पीढियां तथा उनके कई सदस्य एक साथ एक सूत्र में बंधे रहते है। हर सुख दुख में एक दूसरे का साथ निभाने के मामले में भारतीयों का कोई सानी नही है। यद्यपि तुलसीदास जी ने कहा है कि सुत बनितादि जानि स्वार्थरत,अंत चले सभही ते, लेकिन ऐसा प्राचीन भारत मे उनके काल मे कम ही देखा जाता था कि स्वार्थ के कारण पत्नी तथा बच्चे किसी को छोड़ कर गए हो। लेकिन आजकल ऐसी विसंगतियां बढ़ गई है। अर्थप्रधान इस युग मे रिश्तों से ज्यादा अहमियत पैसे की हो गयी है। आज के इस दौर में पैसे के लिए पुत्र पिता को भी छोड़ देता है और भार्या अपने पति को। पहले रिश्तों का मोह हुआ करता था लेकिन अब वो मोह सम्पति का अधिक हो गया है। सम्पति के लिए झगड़े होना आम बात हो गया है। गोस्वामी जी ने ही लिखा है कि जहां सुमति तह सम्पत्ति नाना, जहाँ कुमति तह विपत्ति निदाना, अर्थार्थ जहां पर सभी प्रेम पूर्वक रहते है वहां सम्पत्ति अपने आप ही अधिक मात्रा में हो जाती है। लेकिन आजकल उल्टा हो गया है। जैसे ही सम्पत्ति की अधिकता होती है वैसे ही प्रेम तिरोहित हो जाता है। जबकि यह सबको पता है कि प्रेम तथा वात्सल्य का कोई मोल नही होता लेकिन उसका भी मोल लगाते आजकल के इंसान देरी नही करते।

अभी हाल ही में हमारे देश मे एक वाकया बड़ी चर्चा में है। पांच हजार करोड़ का मालिक विजयपत सिंघानिया अपने बेटे से अलग रहकर दर दर की ठोकर खाने को मजबूर हो रखा है जिसने 1980 से लेकर 2015 तक सतत 35 साल मेहनत करके अपने पिताजी द्वारा दी गई अमानत रेमंड को शीर्ष तक पहुंचाया। द कम्प्लीट मेन के टैगलाइन से जानी जाने वाली कम्पनी के मालिक ही अपने बेटे को कम्प्लीट मेन नही बना सके। उसमे व्यवसाय के गुण भले ही विकसित कर दिए हो लेकिन मूलभूत सामाजिक गुण पितृप्रेम का विकसित नही कर सके।
ओर तो और बाप-बेटे के बीच विवाद बढ़ा तो बेटे गौतम सिंघानिया ने पिता से रेमंड ग्रुप के ‘अवकाशप्राप्त चेयरमैन’ का तमगा भी छीन लिया। उन पर गाली-गलौज की भाषा के इस्तेमाल का आरोप लगाया गया। इस पर विजयपत सिंघानिया ने कहा कि उन्हें उनके दफ्तर से निकाल दिया गया और उनके अधिकार छीन लिए गए। उन्होंने देश के प्रतिष्ठित पुरस्कार पद्म भूषण की चोरी का भी आरोप लगाया।

इससे पहले भाई भाई के बीच झगड़े तो देखे गए है जैसे अम्बानी बंधुओ के बीच,फोर्टिज वाले सिंह ब्रदर्स के बीच, शराब कारोबारी पॉन्टी चड्डा तथा हरदीप के बीच लेकिन बाप बेटे के बीच यह अपनी तरह का पहला मामला है।जहाँ बाप को रहने का ठिकाना ही नही मिल रहा है।
इसके अलावा एक ओर दूषण पिछले वर्षों से हमारे देश मे फैल रहा है वो है तलाक का। हमारे देश मे वैवाहिक बंधन को जन्मजन्मांतर का बंधन समझा जाता था। और कुछ नही तो मिनिमम सात जन्म का साथ तो माना ही जाता था, उससे वो पहले एक जन्म तक आया और अब निभ गया जितना साथ की ओर बढ़ रहा है। तलाक के मामले ज्यादा हो रहे है। पहले के मामलों में पति पत्नी के बीच झगड़ा भले ही हो जाये पर पारिवारिक बंधन के कारण सुलह भी जल्दी हो जाती थी लेकिन अब बदलते परिवेश में झगड़े सीधे अदालत तक पहुंच रहे है। शादियों के खर्चे बढ़ रहे है, दिखावा भरपूर हो रहा है, शादी पर बड़े बड़े मंडप, डेकोरेशन किये जाते है, लाखो करोड़ो केवल देखादेखी में उड़ा दिए जाते है लेकिन भरोषा नही रहता कि शादी कितने दिन टिक पाएगी। हाँ हमारे गांव अभी भी इस दूषण की चपेट में कम है, लेकिन शहर के लोग इस ओर तेजी से बढ़ रहे है।

कुल मिलाकर बात यह है कि परिवार में प्रेम नही रहेगा तो जीने में भी मज़ा नही रहेगा। मोह के बंधन स्वार्थ के बंधनों से ज्यादा मजबूत होते है। अर्थ के धागों से स्नेह के धागे अधिक मजबूत होते है। जीवन बहुत छोटा होता है तथा अंततोगत्वा सभी को उसी शून्य में विलीन होना है तो अपनी जिंदगी को शून्य होने से बचाने के लिए सन्तान में प्राचीन मूल्यों के अनुसार संस्कार सिंचन जरूर करे जिससे वो अच्छे पुत्र व पति तथा अच्छी पत्नी व बहु साबित हो।
सर्व आश्रयदात्री भारत माता की जय