सवर्णों को झुनझुना!


केबिनेट द्वारा पारित आर्थिक पिछड़े सवर्णों को 10% आरक्षण देने सम्बन्धी प्रस्ताव लोकसभा में 124वां संशोधन बिल के रूप में कल पेश किया गया।
Photo/Loktej

केबिनेट द्वारा पारित आर्थिक पिछड़े सवर्णों को 10% आरक्षण देने सम्बन्धी प्रस्ताव लोकसभा में 124वां संशोधन बिल के रूप में कल पेश किया गया। कैबिनेट ने ईसाइयों और मुस्लिमों समेत अनारक्षित श्रेणी के लोगों को नौकरियों और शिक्षा में 10% आरक्षण देने का फैसला लिया था। इसका फायदा 8 लाख रुपए सालाना आय सीमा और करीब 5 एकड़ भूमि की जोत वाले गरीब सवर्णो को मिलेगा।

केंद्रीय मंत्री थारवचंद गहलोत ने सवर्ण आरक्षण संशोधन बिल लोकसभा में पेश किया। कांग्रेस, एनसीपी, बीएसपी, आम आदमी पार्टी ने बिल का समर्थन किया। जबकि समजवादी पार्टी ने इस बिल को पेश करने के तरीके का विरोध किया। डीएमके ने बिल का विरोध किया।
बहस के दौरान कांग्रेस सांसद के वी थामस ने कहा कि इस बिल से पार्टी को ऐतराज नहीं है। लेकिन इसे राजनीतिक मकसद के साथ जल्द लाया गया। टीएमसी सांसद सुदीप बंदोपाध्याय ने कहा कि सरकार का कार्यकाल केवल 100 दिन के लगभग बचे होने के वक्त पर ये बिल लाना सवाल खड़े करता है। यह बिल नौकरियों से संबंधित नहीं है, इस बिल के जरिए युवाओं को छला जा रहा है।

केंद्रीय मंत्री रामविलास पासवान ने कहा कि अगड़ी जातियों के गरीब लोगों को 10 फीसदी आरक्षण दिए जाने से वो खुश है। उन्होंने 60 फीसदी आरक्षण को संविधान की 9वीं अनुसूची में डाले जाने की मांग की।

वित्त मंत्री अरुण जेटली ने कहा कि संसद में पास होकर 50% से ज्यादा आरक्षण संभव है। 50% आरक्षण जातिगत है जो सामाजिक तौर पर पिछड़े वर्ग के लिए है। सामाजिक भेदभाव कम करने के लिए आरक्षण का प्रावधान किया गया था। जबकि यह आर्थिक तौर पर दिया जाना तय हुआ है। उन्होंने 2014 का कांग्रेस का घोषणा पत्र भी पढ़कर सुनाया जिसमे कांग्रेस ने गरीब सवर्णों को आरक्षण देने का वादा किया था।
कांग्रेस ने राफेल की तर्ज पर आरक्षण बिल को जेपीसी में भेजने की मांग की है।

वैसे भारत मे आरक्षण का इतिहास बहुत पुराना है। आजादी से पूर्व महात्मा ज्योतिराव फुले ने आरक्षण की मांग की थी जिस पर हंटर आयोग की नियुक्ति की गई थी। आजादी के बाद संविधान के अनुच्छेद 330 के तहत अनुसूचित जातियों ,जनजातियों के लिए नौकरियों एवं अनुच्छेद 332 के तहत राजनीति में जनसंख्यानुपात में आरक्षण की व्यवस्था की गई। संविधान के अनुच्छेद 340 में सामाजिक व शैक्षिक रूप से पिछड़े वर्गो के लिए आयोग बनाने का उल्लेख किया गया है। इसके आधार पर 1953-55 में काका कालेलकर आयोग का व 1978-80 में मंडल कमीशन का गठन किया गया। बिन्देश्वर प्रसाद मण्डल की अध्यक्षता में मण्डल आयोग हालांकि मोरारजी भाई देसाई ने गठित किया था लेकिन उनकी सरकार चली गई थी बाद में वीपी सिंह के कार्यकाल में वो लागू किया गया। मंडल आयोग ने पाया था कि देश में 3,743 जातियां हैं। पिछड़ी जातियों के लोगों की संख्या देश की जनसंख्या की आधी से ज्यादा है। इस वजह से आयोग ने सरकारी नौकरियों में पिछड़े वर्ग के लिए 27 फीसदी आरक्षण की सिफारिश की थी। इसके बाद एससी के लिए 15 फीसदी, एसटी के लिए 7.5 फीसदी और पिछड़े वर्ग केलिए 27 फीसदी यानी कुल मिलाकर 49.5 फीसदी आरक्षण देश में लागू हो गया।

नरसिम्हाराव सरकार ने आर्थिक रूप से पिछड़े सवर्णों को 10% आरक्षण देने की सिफारिश की थी लेकिन इंदिरा साहनी मामले में फैसला देते हुए सुप्रीम कोर्ट ने इसे खारिज कर दिया।

अब वापिस चुनाव से पहले सवर्ण मतदाताओं को साधने के लिए एक बार फिर यह प्रस्ताव पेश हुआ है। संविधान के अनुसार यह सम्भव नही है परन्तु दूसरे नजरिये से देखे तो जो आर्थिक आधार तय किया गया है उसमें सवर्णों की अधिकतर जनसंख्या समाहित हो जाती है। आयकर दाता को किस प्रकार सरकार आर्थिक पिछड़ा मानती है यह समझ से बाहर है। समझ से यह भी बाहर है कि सवर्ण तथा अन्य धर्मों के लिए बचे हुए 50% में से उन्हें 10% काटकर वही उन्हें वापिस थमा देना उस झुनझुने के समान है जो किसी बच्चे की मां सारे खिलोने लेकर वापिस एक झुनझुना खेलने के लिए थमा देती है।

सर्व आश्रयदात्री भारत माता की जय