चुनाव पर नया शगूफा: सवर्ण आरक्षण


केंद्रीय कैबिनेट ने आर्थिक रूप से पिछड़े स्वर्ण जाति के लोगों को 10 फीसदी आरक्षण को मंजूरी दे दी है।
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लोकसभा चुनाव से पहले केंद्र सरकार ने सवर्णों को आकर्षित करने के लिए नया दांव खेला है। केंद्रीय कैबिनेट ने आर्थिक रूप से पिछड़े स्वर्ण जाति के लोगों को 10 फीसदी आरक्षण को मंजूरी दे दी है। इस आरक्षण का फायदा ऐसे लोगों को मिलेगा जिसकी कमाई सालाना 8 लाख से कम है।

सवर्ण जाति के मतदाता भाजपा के परंपरागत वोटर है जो एसटी एससी एक्ट में सुप्रीम कोर्ट द्वारा लाये गए संशोधनों को सरकार द्वारा अध्यादेश लाकर रद्द कर देने के कारण नाराज चल रहे है।

जानकारों की अगर माने तो तीनों राज्यो में सरकार चले जाने का मुख्य कारण भी सवर्ण वर्ग की नाराजगी रहा। उसके अलावा जो राजनैतिक पार्टियां पिछड़ी जातियों की राजनीति करती थी उन्होंने भी अपना दायरा बढ़ाने के लिए काफी समय से पिछड़े सवर्णों को आरक्षण की मांग प्रारम्भ कर दी। रामदास अठावले ने तो पिछड़े सवर्णों के लिए 25% आरक्षण की मांग करते हुए आरक्षण का दायरा 75% करने की मांग करदी।

हाल ही मे आये चुनाव परिणाम तथा सवर्णों द्वारा व्यक्त की जा रही नाराजगी के मद्देनजर सरकार ने निर्णय तो कर लिया पर इसके लागू होने में शंका है।

संविधान के अनुच्छेद 15 तथा 16 में शिक्षा तथा रोजगार में पिछडो को आरक्षण देने का प्रावधान है परन्तु उच्चतम न्यायालय ने इसको 50% से अधिक करने पर रोक लगाई हुई है। हाल की व्यवस्थानुसार एससी के लिए 15, एसटी के लिए 7.5 व अन्य पिछड़ा वर्ग के लिए 27 फीसदी आरक्षण है। इसमे आर्थिक आधार पर आरक्षण की कोई व्यवस्था नहीं है। इसीलिए अब तक जिन राज्यों में आर्थिक आधार पर आरक्षण देने की कोशिश हुई उसे कोर्ट ने खारिज कर दिया।

इससे पूर्व 1992 में प्रधानमंत्री पीवी नरसिंह राव ने गरीब सवर्णों को 10 प्रतिशत आरक्षण देने का फैसला किया था। सुप्रीम कोर्ट ने इसे असंवैधानिक करार देते हुए खारिज कर दिया था। बीजेपी ने 2003 में एक मंत्री समूह का गठन किया, हालांकि इसका कोई फायदा नहीं हुआ और वाजपेयी सरकार 2004 का चुनाव हार गई। वर्ष 2006 में कांग्रेस ने भी एक कमेटी बनाई जिसको आर्थिक रूप से पिछड़े उन वर्गों का अध्ययन करना था जो मौजूदा आरक्षण व्यवस्था के दायरे में नहीं आते हैं।लेकिन इसका कोई फायदा नहीं हुआ, ढाक के वही तीन पात बरसो से चले आ रहे है।

रविवार 6 जनवरी को रामलीला मैदान में दलितों के लिए समरसता खिचड़ी बनवाने के अगले ही दिन सवर्णों पर दांव क्यों चला गया? जानकारों का मानना है कि सवर्ण वोटरों की नाराजगी से निपटने के लिए केंद्र सरकार ने ये कदम उठाया है। क्योंकि उसे अब आम चुनाव में जाना है। दलितों और पिछड़ों की ओर झुकाव की वजह से बीजेपी को यह आशंका थी कि कहीं उसका परम्परागत वोटर हाथ से खिसक न जाए।

राजस्थान सरकार ने उच्च वर्ग के गरीबों के लिए 14 प्रतिशत और पिछड़ों में अति निर्धन के लिए पांच फीसदी आरक्षण की व्यवस्था की थी, उसे भी निरस्त कर दिया गया था। हरियाणा सरकार का भी ऐसा फैसला न्यायालय में नहीं टिक सका था। तो फिर क्या केंद्र सरकार के इस कदम का क्या होगा?

यह सिर्फ सवर्ण मतदाताओं की नाराजगी दूर करने के लिए उन्हें लुभाने का एक प्रयास भर है। यह कांग्रेस तथा अन्य दल जो पिछड़े वर्ग की राजनीति करते है उन्हें दोनो तरफ से घेरते हुए फायदा लेने का यह सरकार का मास्टरस्ट्रोक है पर इसका क्या फायदा होगा यह तो वक्त ही बताएगा।

सर्व आश्रयदात्री भारत माता की अनन्त जयजयकार