बुढ़ापे का एकाकीपन; एक अभिशाप


बुढापा शब्द जेहन में आते ही एक अजीब सा अनुभव मन मे हो जाता है।
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बुढापा शब्द जेहन में आते ही एक अजीब सा अनुभव मन मे हो जाता है। राजकुमार सिद्धार्थ को उनके पिताजी ने जिन लौकिक स्थितियों से दूर रखने का निर्देश दिया उनमे बीमार, मृत, सन्यासी के अलावा जीर्ण अवस्था को प्राप्त हुए वृद्ध भी थे। कहा जाता है कि उन्होंने जब सबसे पहले बूढ़े व्यक्ति को देखा तो अपने सारथी सौम्य से उसके बारे में पूछा।सारथी ने बताया कि कभी ये बूढ़ा भी सुदर्शन नौजवान था। सिद्धार्थ बेचैन हो गए। उन्होंने पूछा कि क्या वे भी एक दिन ऐसे ही हो जाएंगे। सारथी ने बताया कि बुढ़ापे के प्रहार से कोई नहीं बच पाता। उसी दिन से राजकुमार सिद्धार्थ के मन मे वैराग्य के बीज अंकुरित हुए थे जो कालांतर में वट वृक्ष बनकर सम्पूर्ण संसार मे उन्हें भगवान गौतम बुद्ध के रूप में प्रतिस्थापित कर गए।

सच मे बुढापा बहुत दारुण दुख देने वाली अवस्था है। शरीर असमर्थ हो जाता है, शरीर के अवयव सम्पूर्ण सामर्थ्य से क्रियाशील नही रह पाते। शारिरिक असमर्थता के कारण व्यक्ति चाह कर भी कुछ नही कर पाता है। वैसे शरीर से व्यक्ति तभी लाचार होता है जब वो मन से मान लेता है, मनोबल कमजोर होते ही जीर्ण शरीर में कमजोरी हावी हो जाती है। लेकिन यह मनोबल पारिवारिक वातावरण से ही सुदृढ या कमजोर होता है, जैसे कि देखा गया है। जिन वृद्धों की सेवा सुश्रुषा उनके परिजन यथायोग्य करते है, उनके मन मे उल्लास सदैव रहता है तथा वो जल्दी वृद्धता को प्राप्त भी नही होते है। लेकिन जिनको उस प्रकार का लाभ नही मिलता अथवा जिनकी कोई सुनने वाला नही हो, उस पर भी जीवन साथी आयु के अंतिम पड़ाव से पहले ही छोड़ कर जा चुके हो उनकी मनोदशा एकाकी जीवन के कारण नकारात्मक हो जाती है तथा वो किसी तरह से जीवन को ढोते है, ऐसा प्रतीत होता है।

आयु के अंतिम पड़ाव में ही जीवनसाथी की अत्यधिक जरूरत महसूस होती है। उस समय प्राणी के शरीर तथा मन की वासनाएं लगभग समाप्त हो चुकी होती है, तथा वासनाओं की इति के बाद जो बचता है वो विशुद्ध प्रेम ही एक दूसरे के प्रति होता है। लेकिन प्रयाण काल से पूर्व अगर साथी प्रयाण कर जाए तो जीवन किसी बोझ से कम नही होता। क्योकि सन्तान युवावस्था को प्राप्त हो चुकी होती है, विवाह होने के पश्चात उनकी अपनी निजी जिंदगी हो जाती है तो संस्कारो के कमोबेश के कारण या कहे कि संस्कृति के पाश्चात्यीकरण के कारण अपने वृद्ध परिजनों को समय नही दे पाते है। एकाकी जीवन जी रहा व्यक्ति इन सब से मानसिक कमजोर हो जाता है जिसकी परिणीति शारीरिक कमजोरी में हो जाती है।

लेकिन हमारी रूढ़िवादिता के कारण हमने कभी उस ओर ध्यान नही दिया कि उम्र के इस पड़ाव में भी जीवनसाथी का प्रतिस्थापन्न हो सकता है। या यह भी कह सकते है कि बच्चे जो कि जवान हो चुके होते है वो इस उम्र में किसी अन्य को अपने माँ या बाप के रूप में स्वीकार नही कर सकते। लेकिन रूढिवादिता, हठधर्मिता के कारण एक प्राणी एकाकी जीवन के लिए मजबूर हो जाता है।
परसो रविवार को सूरत के वराछा स्थित उमियाधाम के विश्वास भवन में एक सम्मेलन आयोजित हुआ था। यह सम्मेलन अहमदाबाद की संस्था अनुबंध फाउंडेशन द्वारा आयोजित किया गया। इसमें 45 से लेकर 82 साल तक उम्र के 235 वरिष्ठ नागरिकों ने हिस्सा लिया। सम्मेलन में डॉक्टर, इंजीनियर, उद्योगपति और नौकरी पेशा से जुड़े लोग शामिल हुए। इनमें 180 पुरुष और 85 महिलाएं शामिल थीं। यहां लोगों ने बताया कि वो जीवन साथी की खोज में हैं। सूरत में ऐसा सम्मेलन पहली बार हुआ। कार्यक्रम स्थल पर सुबह 10 बजे से लेकर शाम 6 बजे तक लोगों की भीड़ रही।

शादी की कुछ शर्तें भी आयोजकों ने रखी थी, जैसे कि संतानों की क्या स्थिति है, और वह कितने जिम्मेदार हैं? स्वास्थ्य कैसा है?दोनों के संताने नए रिश्ते को मजूरी दे रहे हैं या नहीं?शादी के बाद दोनों में से एक पात्र नहीं रहा तो क्या करेंगे? ऐसे आयोजन एकाकी वृद्ध लोगो के लिए जरूरी ही नही वरदान स्वरूप भी है। अगर एकाकीपन न रहे तो बुढ़ापे में शारिरिक तथा मानसिक कमजोरी कभी भी हावी नही हो सकती तथा व्यक्ति कुछ समय और आनन्द से गुजार सकता है, पर उसके लिए हमे हमारी सोच बदलनी होगी। यह समझना होगा कि बुढ़ापे की शादी सिर्फ एक दूसरे को मानसिक सहारा देने के लिए होती है।

सर्व आश्रयदात्री भारत माता की जयजयकार