मन की बात : प्रधानमंत्री जी से


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प्रधानमंत्रीजी कल आप हमारे शहर में आये, सबको बड़ा उल्लास था आपकी बात सुनने का, आपसे संवाद करने का जो यूथ कॉन्क्लेव के नाम से यहां के जनप्रतिनिधियों द्वारा आयोजित किया गया था। मैं भी इस आयोजन का साक्षी बनने पहुंचा था। मन में यह अरमान था कि आपको रूबरू सुनूंगा, क्योकि मुझे एक वक्ता के रूप में आप मुझे अच्छे लगते हो। लेकिन कल का अनुभव मेरे जीवन का अविस्मरणीय रहा। मैं मेरे मित्रो के साथ वहां पहुंचा था तथा एक मित्र जो सिलवासा से यहां आए थे तथा आपके बड़े भारी समर्थक है। उनके पास अंदर आने का पास नही था तथा मेरे पास तीन पास अतिरिक्त थे तो मेरे अन्य मित्र तो अंदर चले गए पर मैं उनके इंतजार में बाहर खड़ा रहा। उनको आने में थोड़ी देरी हो गई और तब तक एंट्री बन्द हो गई।

मैं वहां मेरे मीडियाकर्मी मित्रो के साथ खड़ा था। तभी मुझे मेरे वार्ड के पार्षद विजय चौमाल दिखाई दिए तो मैने उनको सम्बोधन करके मेरे पास बुलाया लेकिन वो पूरे लावलश्कर के साथ थे। उन्होंने मुझे नाम पूछा ओर तुरन्त डिटेन कर लिया। मैं हक्का बक्का रह गया। वैसे यह सामान्य प्रक्रिया है कि अगर कोई व्यक्ति पर किसी प्रकार की शंका हो तो उसे ऐसी आम सभा से एक तरफ करके नजरबंद कर दिया जाता है। लेकिन वो मेरे साथ हुआ तो मेरे लिए यह आश्चर्य जनक था क्योकि मेरा ऐसा इंटेंशन कतई नही था। फिर मुझे उन लोगो पर आश्चर्य हुआ जो मुझे चिन्हित कर रहे थे जबकि वो मुझे बड़ी अच्छी तरह जानते थे।

मेरे साथ जो व्यक्ति आये गए उनकी जानकारी पुलिस आयुक्त कार्यालय में मुझे बैठकार ली गयी तथा थोड़े ही समय मे उनकी फोटो सारे पीसीबी, डीसीबी तथा एसओजी के पास थी और वो उन्हें ढूंढने में लग गए जबकि उन आम शहरियों को इसका भान भी नही था, न वो ऐसा सोच भी सकते थे। उनका कार्य सूरत में समाजसेवा का है तथा इसके लिए सभी उन्हें जानते भी है। उनको बेवजह ढूंढा जाना मेरे लिए घोर आश्चर्यजनक था।  लेकिन उस पर भी मुझे इतना दुख नही हुआ जितना मुझे वहां ले जाकर फालतू की पूछताछ करने तथा मेरे फोन को न उठाने देने से हुई ।

प्रधानमंत्री जी आपको परिवार का दर्द नही मालूम है। आपको नही मालूम है कि एक पत्नी और बच्चा जब बारबार फोन करने पर जब सामने से बारबार नो रिप्लाई होता है तो उनको कितनी टेंशन होती है।  आप अपने उद्बोधन में बोल रहे थे कि विपक्षियों को आपसे डर है, पर प्रधानमंत्री जी मैं यह पूछता हूँ कि एक आम शहरी से आपको क्या डर है? आपके जनप्रतिनिधियों को यह डर क्यो है कि एक पत्रकार आपका विरोध कर सकता है? यह डर क्या कहलाता है?

आपने अपने उद्बोधन के आखिर में जो बाहर खड़े रह गए उनसे माफी मांगी थी, बाहर मैं भी खड़ा रह गया था क्योकि मैं आपके एक प्रशंसक की राह देख रहा था। लेकिन मुझे वहां से बिना वजह उठा लिया गया। मुझसे इस गलती की माफी कौन मांगेगा प्रधानमंत्री जी जो मेरे कुछ न करने के बावजूद भी मेरे साथ हुआ है?

बाते बहुत है प्रधानमंत्रीजी लेकिन आपके मन की बात तो सब सुनते है लेकिन इस आम आदमी के मन की बात कौन सुनेगा?
खैर कोई बात नही, हम तो मन की बात को मन मे रख लेंगे लेकिन जो समाजसेवी मेरे साथ थे उनके अपमान की बात क्या मुझे मन मे रखने पर आत्मग्लानि नही होगी? तो फिर मैं किससे कहूँ?

चलो उसे ही कह देता हूँ जिसे आप ओर मैं दोनो माँ कहते है। सर्व आश्रयदात्री मेरी भारत माँ।

सर्व आश्रयदात्री भारत माता की अनन्त जयजयकार के साथ अपने आप को ही अब पूछता हूँ हाऊ ज द जोश ? और मेरी कलम मुझे अब ही जबाब दे रही है हाई सर।