हमारे देश की जय हो, पिता दशमेश की जय हो!


इस दृश्यमान जगत में हर व्यक्ति, वस्तु, सजीव, निर्जीव सभी नाशवान है।
Photo/Loktej

सुप्रभात। इस दृश्यमान जगत में हर व्यक्ति, वस्तु, सजीव, निर्जीव सभी नाशवान है। जो दृश्य है वो सभी एक न एक दिन नष्ट होने वाला है। अगर कोई चीज अक्षर है तो वह अदृश्य है, उसका सम्बन्ध भले ही दृश्य जगत से है परन्तु वो स्वयं अदृश्य है तथा युगों-युगों तक वो रहती है, वो है व्यक्ति की कीर्ति । आज हम एक ऐसी घटना का स्मरण करने वाले हैं जो घटित 314 वर्ष पूर्व हुई थी लेकिन उसका उल्लेख आने वाली सदियों में भी होता रहेगा। आज ही के दिन विश्व इतिहास की क्रूरतम घटनाओं मे से एक घटना हुई थी।

आज के दिन 26 दिसम्बर 1704 को सिख धर्म के दसवें गुरु गोविंदसिंह जी के दोनों छोटे पुत्रों को सरहिंद के नबाब वजीर खान ने जिंदा दीवार में चुनवा दिया था। सन 1704 के दिसम्बर का आखिरी सप्ताह विश्व इतिहास में सदैव अंकित रहेगा क्योंकि इस सप्ताह में एक ऐसा युद्ध लड़ा गया जो अद्वितीय था। उसे हम चमकौर के युद्ध के नाम से जानते हैं। 22, 23, 24 दिसम्बर को हुए इस युद्ध मे गुरु गोविंदसिंह जी के दो बड़े पुत्रों सहित सिर्फ चालीस सिख योद्धाओं ने लाखों की संख्या में लड़?रहे आततायियों से लोहा लिया था। सार्दुल पुत्र जिस प्रकार मृगया करता है उसी प्रकार गुरु के प्यारे मुगल सैनिकों पर टूट पड़े। इस युद्ध में गुरुजी के दोनों साहिबजादे अजीतसिंह, जुंझारसिंह ने अपनी शहादत दी लेकिन गुरु गोविंदसिंह जी पर उन योद्धाओं ने आंच भी न आने दी। उन्हें सुरक्षित वहां से निकाल दिया था।
गुरुजी की माता गुजरीजी तथा दोनों छोटे पुत्र नदी पार करते हुए पहले ही बिछुड़ गए थे। उनके साथ में उनका पुराना रसोइया था जिसने भय तथा लालच में उनका पता सरहिंद के नबाब वजीर खान को बता दिया। नबाब ने उन्हें गिरफ्तार करवाकर बुर्ज की दीवार पर नजरबंद करवा दिया।

वहां न खाने पीने का बंदोबस्त था न ओढऩे-बिछाने के लिए चादर। माता गुजरी तथा गुरु पुत्रों ने ऐसी तीन रातें वहां गुजारी थी, उसी की याद में सिख धर्मानुयायी यह तीन रातें खुले में शबद कीर्तन करके गुजारते हैं। जब दोनों गुरुपुत्रों को नबाब के सामने पेश किया गया तो दोनों सिंह शावक के समान निर्भय खड़े थे। उनको भय, प्रलोभन दिया गया किंतु वो दोनों नन्हे बच्चे धर्मच्युत होने के लिए तैयार नहीं हुए। इस पर क्रोधित होकर नबाब ने उनको दीवार में चुनवा देने का आदेश दे दिया।
जब दीवार चुनी जा रही थी तब दोनों के चेहरे पर किसी भी प्रकार का भय न होकर एक संतुष्टि थी कि स्वाभिमान के साथ जीवन का अंत हो रहा है जबकि उनकी उम्र उस समय मात्र 7 साल और 5 साल थी।

‘जोरावर जोर से बोला, फतेहसिंह शेर सा बोला,
रखो ईंटे, भरो गारे, चुनो दीवार हत्यारे,
निकलती सांस बोलेगी,हमारी लाश बोलेगी,
हमारे देश की जय हो, पिता दशमेश की जय हो।

जब दीवार चुनी जा रही थी तब जोरावरसिंह की आंखों में आंसू देख फतेहसिंह बोले क्या बात है भैया,आंसू? किस बात का डर है? तब जोरावरसिंह ने कहा कि डर तो हमारे नजदीक भी नही आ पाता, लेकिन तुमसे दुनिया में मैं पहले आया था और जा तुम पहले रहे हो इस बात का दुख हो रहा है। दोनों साहिबजादों की शहादत की खबर सुनकर माता गुजरी ने भी देह त्याग दी। उनके अंतिम संस्कार के लिए नवाब ने जमीन नहीं दी तो दीवान टोडरमल ने सोने की 78000 मोहरे फैलाकर 4 वर्गमीटर का टुकड़ा खरीदा, जो आज तक के इतिहास में सबसे महंगा जमीन का सौदा था। जिसे अभी फतेहगढ साहिब के नाम से जाना जाता है। हमें हमारे इतिहास तथा हमारे पुरखों की कीर्ति का सदैव स्मरण रहे, इसी अभिलाषा के साथ

सर्व आश्रयदात्री भारत माता की अनन्त जयजयकार