रामजन्मभूमि पर सरकार का नया दांव


अयोध्या रामजन्मभूमि मंदिर विवाद में केंद्र सरकार ने एक नई कड़ी जोड़ दी है।
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अयोध्या रामजन्मभूमि मंदिर विवाद में केंद्र सरकार ने एक नई कड़ी जोड़ दी है। उसने सुप्रीम कोर्ट में अर्जी दायर कर मांग की कि अयोध्या की गैर-विवादित जमीनें उनके मूल मालिकों को लौटा दी जाएं। 1991 से 1993 के बीच केंद्र की तत्कालीन पीवी नरसिम्हा राव सरकार ने विवादित स्थल और उसके आसपास की करीब 67.703 एकड़ जमीन का अधिग्रहण किया था। सुप्रीम कोर्ट ने 2003 में इस पर यथास्थिति बरकरार रखने के निर्देश दिए थे।  वैसे रामजन्म भूमि का विवाद 2.77 एकड़ का है जिसके 0.313 एकड़ हिस्से में विवादित ढांचा था जिसको दिसम्बर 1992 में ढहा दिया गया था। उसी जगह पर हाल में रामलला विराजमान है तथा जन्मभूमि भी वही मानी जाती है। केंद्र की अर्जी पर भाजपा और सरकार का कहना है कि हम विवादित जमीन को छू भी नहीं रहे।

इसके लिए केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में 33 पन्नो की अर्जी दाखिल की है जिसमे इस विवादित जगह को छोड़ कर बाकी जमीन मूल मालिको को लौटाने का जिक्र है। 1993 के कानून के तहत अधिग्रहित की गई शेष संपत्ति पर किसी भी मुस्लिम पक्ष की ओर से मालिकाना हक का दावा नहीं किया गया है। वैसे यह जमीनें उनके मूल मालिकों को लौटाने की मांग राम जन्मभूमि न्यास की है। न्यास ने अपनी 42 एकड़ जमीन मांगी है। इसके अलावा तर्क यह भी है कि 1994 के फारुकी केस में सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि अगर केंद्र चाहे तो सेंट्रल एरियाज ऑफ अयोध्या एक्ट के तहत मूल विवाद के 0.313 एकड़ इलाके के अलावा अतिरिक्त अधिग्रहित जमीनें उनके मूल मालिकों को लौटा सकता है।

इन सब बातों को देखते हुए प्रथमदृष्टया यही लग रहा है कि गैर विवादित भूमि पर न्यास के अलावा किसी का भी दावा नही है तो न्यास को भूमि लौटने में कोई अड़चन नही है। परन्तु वहां की स्थिति देखते हुए प्रेक्टिकल में नही लगता कि यह सम्भव हो पायेगा। यूपी के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने इस कदम पर कहा कि मैं सरकार के इस कदम का स्वागत करता हूं। अब हमें भूमि के गैरविवादित हिस्से पर काम शुरू करने की अनुमति मिलनी चाहिए। इलाहाबाद हाईकोर्ट की तीन सदस्यीय बेंच ने 30 सितंबर 2010 को 2:1 के बहुमत से 2.77 एकड़ के विवादित परिसर के मालिकाना हक पर फैसला सुनाया था। यह जमीन तीन पक्षों- सुन्नी वक्फ बोर्ड, निर्मोही अखाड़ा और रामलला में बराबर बांट दी गई थी। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा था कि जिस जगह पर रामलला की मूर्ति है, उसे रामलला विराजमान को दे दिया जाए। हिन्दू एक्ट के तहत रामलला भी एक पक्षकार है जिनकी तरफ से न्यास केश लड़ता है। राम चबूतरा और सीता रसोई वाली जगह निर्मोही अखाड़े को दे दी जाए। बचा हुआ एक-तिहाई हिस्सा सुन्नी वक्फ बोर्ड को दिया जाए। लेकिन इस फैसले को निर्मोही अखाड़े और सुन्नी वक्फ बोर्ड ने नहीं माना और उसे सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दे दी।

तबसे यह विवाद तारीख दर तारीख चल रहा है। कल से धर्म संसद चालू होने वाली है तथा उसी के मद्देनजर केंद्र सरकार ने यह दांव खेला है कि कैसे भी करके सन्त तथा हिंदूवादी नेता नाराज न हो क्योकि यह वर्ष चुनावी वर्ष है तथा भाजपा के परम्परागत वोटर इस मामले से पूर्ण प्रभावित भी होंगे। इसलिए पार्टी ने फूंक कर कदम रखा है ताकि सरकार में उनके सहयोगी भी नाराज न हो तथा उनके समर्थक जो कि इस मामले के कारण नाराज थे वो सकारात्मक हो जाये।
सर्व आश्रयदात्री भारत माता की जय