शिक्षा ही समृद्धि की पहली सीढ़ी है!


शिक्षा का आलोक ही ऐसा होता है जो समृद्धि की ओर व्यक्ति, राष्ट्र तथा विश्व को ले जा सकता है।
Photo/Loktej
अफगानिस्तान के हिन्दूकुश से लेकर भारत के अरुणाचल तक और भारत के कश्मीर से लेकर कन्याकुमारी तक जो भी जाति, धर्म, समाज और भाषा के लोग निवास करते हैं वे सभी पंचनंद और ऋषि कश्यप की संतानें हैं। हालांकि अब भारतीयों के धर्म अलग-अलग होने से उन्होंने अपनी भाषा, संस्कृति और इतिहास को भी बदल लिया है।
यहां के हिन्दू, जैन, बौद्ध, ईसाई, पारसी, मुसलमान, सिख आदि सभी एक ही कुल और धर्म के हैं, लेकिन अब परिस्थितियां बदल चुकी हैं। रोमन, यूनानी, पुर्तगाली, अरब, तुर्क और अंग्रेजों ने सब कुछ बदलकर रख दिया। अब अपने ही लोग अपनों के खिलाफ हैं।
आप यह सोच रहे होंगे कि मैं आज ऐसा क्यो लिख रहा हूँ? वर्तमान में जो कुछ जाति और धर्म के नाम पर घटित हो रहा है , जो अवांछित घटनाएं हम टीवी अखबार में देख सुन रहे है , उन सबसे एक टीस सी हृदय में उठती है। हो सकता है काफी लोग मेरी बात से सहमत नही होंगे पर इस भूभाग पर रहने वाले सभी एक ही है। अज्ञानता तो नही कहूंगा पर कुछ लोगो की स्वार्थ लोलुपता ने सबमे झगड़ा लगवाया है ,जिसका ही परिणाम हम रोजमर्रा में देखते है।
लेकिन जब हम प्राचीन भारत के बारे में अध्ययन करते है ,जब यह देश सोने की चिड़िया कहलाता था तो हमे ज्ञात होता है कि उस समय शिक्षा का पर्याप्त प्रसार यहां पर था। शिक्षा समृद्धि की पहली सीढ़ी होती है। प्राचीन भारत के दो विश्वविद्यालय नालन्दा ओर तक्षशिला विश्व विख्यात थे। जब आततायियों ने भारत पर हमला किया तो सबसे पहले इसके शिक्षा केंद्रों पर , पुस्तकालयों पर निशाना बना उन्हें नष्ट किया।
उसके बाद ही भारत उस कालखण्ड की तरफ बढ़ा जिसे हम गुलामी वाला कालखण्ड कहते है। जिसमे मुगलो ओर अंग्रेजो ने हम पर शासन किया तथा इस सोने की चिड़िया का दोहन करके इसे जर्जर बना दिया। ओर तो ओर शिक्षा पद्धति में भी आमूलचूल परिवर्तन करके मैकाले की शिक्षा पद्धति हम पर थोप दी ।
हम उस प्राचीन स्वर्णिम काल को विस्मृत कर दिये जो हमारी थाती थी। कब अकबर महान हो गया हमे पता ही नही चला , ओर आज जब महाराणा प्रताप के बारे में प्रश्न किया जाता है उस प्रदेश के शिक्षामंत्री यह कह कर पल्ला झाड़ देते है कि अब मेरी कोई व्यक्तिगत राय नही रह गई, इस बारे में रायशुमारी करवाएंगे।
अगर हम अपने गौरव को ही भूल गए तो आने वाली पीढियां किसको याद करके गौरवान्वित महसूस करेंगी? क्या हम विदेशी आक्रांता को ही महान का दर्जा देंगे? सम्राट अशोक को महान बता कर एक प्रकार से अहसान करने वाले उससे पूर्व तथा बाद के शासकों को ,व्यक्तित्वों को क्यो भूल जाते है?
खैर इस बीच मे एक खबर यह है कि अज्ञानता के कारण गृह युद्ध करके बर्बाद हुए देश अफगानिस्तान में भारत द्वारा पुस्तकालय खोला जा रहा है। इस पर अमरीकी राष्ट्रपति ट्रम्प ने जब तंज कसा कि वहां पुस्तके पढ़ेगा कौन? तो भारत ने जबाब दिया कि वहां भारत की ओर से और भी विकास कराए जा रहे हैं। भारत का विश्वास है कि विकास कार्यों में यह मदद युद्ध में तबाह हुए देश के लिए काफी अहम हो सकती है।
शिक्षा का आलोक ही ऐसा होता है जो समृद्धि की ओर व्यक्ति, राष्ट्र तथा विश्व को ले जा सकता है। इस अनुपम कार्य के लिए भारत सरकार को साधुवाद के साथ यह भी आशा करता हूँ कि हमारे देश के प्राचीन गौरव नालन्दा विश्वविद्यालय के जैसे पुस्तकालय का फिर से निर्माण हो , हम मैकाले की शिक्षा व्यवस्था को छोड़ फिर से अपनी व्यवस्थाएं बनाये, हमारे देश के नागरिकों में पुस्तकें पढ़ने की भावना जागृत हो, हमारा भारत फिर से वही गौरवशाली राष्ट्र बने जो विश्वगुरु कहलाता था।
इसी आशा के साथ
सर्व आश्रयदात्री भारत माता की अनन्त जयजयकार।