भीष्म पितामह: वर्तमान परिपेक्ष में


आज पता नही क्यो मेरा भीष्म पितामह पर लिखने का विशेष मन हुआ है।
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आज पता नही क्यो मेरा भीष्म पितामह पर लिखने का विशेष मन हुआ है। इसका एक कारण तो यह भी है कि आज माघ शुक्ला अष्टमी है जिसे हम भीष्म अष्टमी के नाम से जानते है। पुराणो के अनुसार आज ही के दिन भीष्म पितामह ने कई दिनों तक बाणों की शैय्या पर तकलीफमय समय गुजारने के बाद सूर्य के उत्तरायण होने के बाद अपने प्राणों का उत्सर्ग करके उसको भगवान के श्री चरणों मे विलीन किया था। इस कारण के अलावा भी कुछ कारण होंगे ही जो शायद आपको मेरे आज के आलेख में लगेंगे की मैं वहां तक पहुंच पाया हूं।
पहले पितामह भीष्म की ही बात कर लेते है। जन्म से जिनका नाम देवव्रत रखा गया था, भरत वंश के प्रतापी शासक महाराज शांतनु तथा संसार मे सभी पातकी मनुष्यो का उद्धार करने धरा पर जो अवतरित हुई उस देवी गंगा के इकलौते पुत्र देवव्रत, क्योकि उससे पहले के सात पुत्रो को भगवती गंगा महारानी ने अपनी धारा में प्रवाहित कर लिया था तथा उनका संसार चक्र से उद्धार कर दिया था। कहते है कि अष्ट वसु को श्राप मिला था मानव देह धारण करने का जिसमे से सात का तो गंगा मैया ने उद्धार कर दिया पर आखिरी यह द्यु नाम के वसु बच गए थे जिनको मानव जीवन भोगना पड़ा लेकिन युगों युगों तक वो अमर नाम भी कर गए।
ऋषि वशिष्ठ के श्राप के फलस्वरूप द्यु नाम के वसु को मनुष्य जीवन की पीड़ा भोगनी पड़ी, ऐसी पीड़ा जो सामान्य मनुष्य सहन भी न कर पाए, लेकिन भीष्म ने ताउम्र सहन की, तथा हमेशा सिंहासन से बंधे होने के कारण राजा के द्वारा किये गए हर पाप के भागी यानी कि हिस्सेदार भी बने, मतलब की ओर करे अपराध कोई फल पाए कोई और की तरह राजा के हर पाप का जिम्मेदार इतिहास इन्हें बताता रहा है। मतलब साफ है भाई खुद की भी अक्ल लगाना चाहिए क्योंकि शासक का हर निर्णय मानने योग्य हो यह जरूरी नही है।
भीष्म यानी देवव्रत ने अपने पिता को खुश करने के लिए प्रतिज्ञा कर ली थी कि मैं सदा सिंहासन का वफादार रहूंगा ओर शादी नही करूँगा ओर बच्चे भी पैदा नही करूँगा, क्योकि सत्यवती के पिता को लग रहा था कि अगर इसके बच्चे हुए तो हमारे नातियों को तो कुछ समझेंगे ही नही, कुल जमा उनका पराक्रम ओर बलशाली होना उनको ब्रह्मचर्य का उपहार दे गया, होता है कभी कभी, आज भी परम्परा चालू है, जो पराक्रमी होता है उसे सत्तालोलुप कैसे भी करके सत्ता से दूर रखने का प्रयास करते ही है। यही प्रतिज्ञा उनके जीवन की सबसे बड़ी भूल थी, जिसने उनको देवव्रत से भीष्म तो बना दिया लेकिन सिंहासन से भी मजबूती से चिपका दिया।
अन्य भूलो में अपने भाई विचित्रवीर्य के लिए कन्याओं का हरण, उनमे से एक कन्या को निराश्रित छोड़ देना,उस कार्य के लिए अपने ही गुरु भगवान परशुराम से युद्ध करना, बाद में नियोग पद्धति से भ्राता वधुओं को सन्तति युक्त करवाना ओर उसके बाद उस सन्तान के गलत सही निर्णयों का ताउम्र अनुसरण करना। बस यही गलतियां उन्हें भीष्म यानी की भीषण बनाती है।
भीष्म अपने पराक्रम के लिए नही जाने जाते, अपनी दिग्विजयी क्षमता के लिए नही जाने जाते, वो जाने जाते है अपनी गलतियों ओर प्रतिज्ञाओं के लिए। लेकिन इतिहास से हमे भी सीख लेनी ही चाहिए, कि कौनसी वो गलतियां थी जिन्हें दोहराने से बचना चाहिए। वैसे आजकल भी किसी किसी के लिए भीष्म पितामह की संज्ञा दी जाती है। उनमें लगभग वो ही होते है जो योग्य होते हुए भी सत्ता की सीढ़ी ही बनते है, प्राप्त नही कर पाते। या भी इस्तेमाल हो जाते है। वैसे इस्तेमाल होने वालों की संख्या अधिक है, जो बेगानी शादी में अब्दुला दीवाना होकर घूमते रहते है, ऐसे प्रण कर लेते है जैसे सिंहासन को इनकी अत्यधिक जरूरत है, जबकि सत्तानसीन को यह पता भी नही होता कि कोई हमारे लिए भीष्म बना बैठा है।
सर्व आश्रयदात्री भारत माता की जय