भजन, किर्तन, सत्संग बिना ईश्वर प्राप्ति नहीं : श्रीहित अम्बरीषजी महाराज


श्रीहित अम्बरीषजी महाराज ने व्यासपीठ से कथा का रसपान कराते हुए कहा कि धर्म क्या है?
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अम्बरीषवाणी

सूरत। भटार रोड श्रीराम मंदिर में गोलोकवासी विनोद अग्रवाल की स्मृति में 22 से 26 दिसंबर तक हररोज सायं 3.30 से 6.30 के दौरान श्री भक्तमाल कथा आयोजित हुयी है। कथा के प्रथम दिवस श्रीहित अम्बरीषजी महाराज ने व्यासपीठ से कथा का रसपान कराते हुए कहा कि धर्म क्या है? धर्म जिसके पालन से जीवन की पूर्णता श्रेष्ठता प्रसन्नता एवं आनंद का अनुभव हो जहाँ जीवन को ऐसा लगे कि इसकी जय हो गई है। धर्म कई प्रकार के है जब जीवन एक है तो धर्म की भिन्नता क्यो? भगवत गीता में स्पष्ट कहा गया है कि हम संसार में आते ही भगवान को भूल जाते हैं। जब हम गर्भ में रहते है तो नाना प्रकार के कष्ट भोगते हुए भगवान से प्रार्थना करते है कि मुझे संसार में लाओं लेकिन बाहर आते ही संसार की माया हमें जकड़ लेती है। हम इस संसार में रोते आए थे नाना प्रकार के कष्ट पाकर सभी को रोता छोड़ जाऐगे। तब हम जीवन में क्या करे साधन धाम मोक्ष का द्वारा शरीर एक साधन है।

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इससे हम जीवन मरण के चक्र से विलंग होकर भगवान के साथ एकाकार कर सकते है। भगवान की विस्मृति ही हमारे दु:खों का कारण है। सुविधा से सुख नही मिल सकता भगवत स्मरण से ही सुविधा न होते हुए भी आप परमानंद की प्राप्ति कर सकते है। ये जीवन की सुविधा एक बिनाशुल्क की धर्मशाला है इसका आप उपयोग तो कर सकते है लेकिन अधिकार नही जमा सकते। संसार का आश्रय छोड़ भगवान का आश्रय प्राप्त करें इसी में जीव का कल्याण है। हमें बार बार इस संसार में रहने का अभ्यास हो गया है इसलिए हमें इसे छोडऩे में दिक्कत होती है। भक्ति कोई क्रिया नही है, भक्ति एक भाव है भगवान भाव के भुखे है, आपकी पूजा पाठ के नही। बंदर यदि आपका कोई सामान उठा लेता है तो आप प्यार से उसे कुछ खाध सामग्री दिखाए तो वो आपका सामान वापिस कर देता है इसी प्रकार संसार से श्रेष्ट वस्तु भगवत स्मरण से हमें परमात्मा का मिलना हो सकता है। संत पुरूष आपको अपने कथा संकिर्तन के माध्यम से भगवान की अनुभूति करा सकते है।

अभी कोई नास्तिक व्यक्ति बोले कि मुझे भगवान दिखाओं तो मै मानुं मै कहता हुँ मुझे विधुत दिखाओ तो मै उसे मानुं किसने विधुत देखी है बताओं।  बस यही इश्वर है भगवान है विधुत बल्ब, फ्रिज, ए.सी., के रूप में सभी ने देखी लेकिन विधुत का रुप क्या है। इसी प्रकार भगवान कभी श्रीराम, श्रीकृष्ण, श्री गुरूनानक, संत कबीर के रुप में दिखते है। हमारा जन्म क्यों हुआ है धन पद प्रतिष्ठा अन्त में मृत्यु तो हमारे इस जीवन का अर्थ क्या है हमें ईश्वर ने समय दिया है अपने जीवन को सार्थक बनाने के लिए वरना मनुष्य के अलावा सभी प्राणी का अन्तर क्या रह जाएगा। मंंदिर में जो भक्तों की लम्बी कतारें लगती है वो कामनाओं की है भक्ति तो संत कबीर अपना व्यवसाय के साथ भी करते थें। आप सब कथा में आए है कथा को कहानी मत समझना कथा में आपको शब्दों की उर्जा एवं शक्ति मिलेगी । कथा समाज को जगाने के लिए है कहानी बच्चों को सुलाने के लिए होती है। शब्दों में नकारात्मक एवं सकारात्मक दोनों प्रकार की ऊर्जा होती है। आप संत्संग का श्रमण करेंगे तो आपके अंदर सकारात्मक ऊर्जा पैदा होगी-भक्ति मार्ग ही ऐसा मार्ग है जिससे जीव भगवान को पा सकता है क्योंकि इसमें कोई बंधन नही है ज्ञान कभी पूर्ण नही होता लेकिन भक्ति भाव से भगवान आपसे मिलने को मजबूर हो जायेगें। कबीरदास जी के अनुसार जो संसार को देखेगा दुखी रहेगा जो अपने अत: करण को देखेगा वह परमानंद को प्राप्त होगा। जीवन में संत पुरूषों को आर्शीवाद देने का अधिकार तभी है जब उनका आचरण वैसा हो केवल वाणी से आर्शीवाद देने से वह सफल नहीं होगा।

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संतजन के समागम से उनकी कथा से एक विशेष प्रकार की ऊर्जा का प्रार्दुभाव होता है उसमें असीम आनंद और सुख की प्राप्ति होती है संसार में व्यापत पेड़ पौधे सूर्य आकाश, चन्द्रमा, चहचहाते पक्षी, सरसर बहिती सरिता इन सबके पीछे वही भगवान है जो हमें दिखाई नही देगा अनुभूति जरूर देगा। जहां भगवान का संकीर्तन गुणगान होता है वहा स्थान स्वयं में तीर्थ हो जाता है। पतित पावनी गंगा जहां से निकली वह स्थान तीर्थ स्थल हो गया। संसार के छोड़े बिना भगवान की अनुभूति नही हो सकता है। मीरा के गरल विषपान के बाद उनका जीवित रहना गिरधारी के होने का बहुत बड़ा प्रमाण है। संत्संग की महिमा भगवान का गुणगान उससे ही आपके विचारों में परिवर्तन हो जाएगा यदि आप भगवान को खोजने निकले तो आधे अधूरे मिलेगें यदि आपका आस्था श्रद्धा भजन सकीर्तन में विश्वास रहा तो द्रोपती एवं मीरा की तरह भगवान आपको ढ़ूढने पहुंच जाएंगे।

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पंचतत्व की बनी यह काया पंच विकारों से भरी हुई है इस विकार को समाप्त करने के लिए केवल एक ही हरिनाम संकीर्तन इसका उपाय है। विचार कर्म का मूल है विचारों की शुद्धि के लिए जप तप संत्संग की आवश्यकता है। माता कुंती से भगवान कृष्ण ने वरदान मांगने को कहा तो माता बोली मुझे दुख चाहिए-भगवान को आश्चर्य हुआ बोले बुआ ऐसा क्यों माता बोली दुख रहेगा तो तुम्हे याद करेंगे सुख आएगा तो तुम्हे भूल जाएगें।  भारत एक ऐसा देश है और सनातन एक ऐसा धर्म है जिससे वसुधैव कुटुम्बकम की बात कही है जिससे कहा है सर्वे भवन्ति सुखिन: सर्वेे सन्तु निरामया सवे भद्राणि पश्यन्तु, मा कश्चित दुख भाग भवेत अपनी संस्कृति धर्म की मर्यादा महा छोडऩा वरना विश्व में हमारी संस्कृति को समाप्त करने के कुटिल प्रयास हो रहे है। जिससे हमें अपने आने वाली पीढ़ी को सावधान करना है इस प्रकार के प्रयासो को निष्फल करना है।

– लेखन भीम पसरीचा (विहिप सूरत)