सोशल साइट्स का एडिक्शन


आजकल बच्चो से लेकर बुजुर्गों तक सोशल मीडिया का एक अजीब शौक लगा हुआ है।
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आजकल बच्चो से लेकर बुजुर्गों तक सोशल मीडिया का एक अजीब शौक लगा हुआ है। जिसे देखो वो इसपर लगा रहता है। मूलतः चार साइट सबसे ज्यादा प्रचलन में है, फेसबुक, वाट्सअप, ट्विटर और इंस्टाग्राम। आजकल जो इन चारों में से किसी मे नही होता तो उसे बहुत पिछड़ा मान लिया जाता है। ऐसा माना जाता है जैसे वो जमाने की दौड़ में काफी पीछे चल रहा है। आजकल तो कोई कुछ भी करता है उसे पहले ट्वीट करता है या फेसबुक या इंस्टाग्राम में शेयर करता है। अगर यहां शेयर नही की जाए तो ऐसा महसूस करता है जैसे कि उसके द्वारा वो काम किया ही न गया हो।
इन साइट्स पर बच्चे, नोजवान, बुड्ढे, राजनेता, अभिनेता आदि सभी मौजूद मिलेंगे। सबके रोजमर्रा के कामो में एक काम यह भी हो गया है। कुछ न भी करे तो भी कुछ न कुछ डालने को ढूंढ पर स्टेटस लगा ही देते है। और तो ओर इन साइट्स पर फेंक न्यूज की भरमार होती है जिसका कोई अस्तित्व ही न हो। लोग उन्हें अपनी मनोनुकूलता देख कर सही मान कर शेयर भी करते रहते है। अगर कोई बोल दे कि यह समाचार गलत है तो उसे अपनी विचारधारा का विरोधी मान लेते है पर सच्चाई का पता नही लगाते।
परसो शायद फेसबुक का जन्मदिन यानी स्थापना दिवस था। 2004 में स्थापित यह सोशल साइट काफी विस्तरित हो गई है। अरबो की कम्पनी भी हो गई है लेकिन अरबो का समय भी इसने खराब किया है। शायद कुछ स्तर तक मानसिक सुकून भी छीना है।
फेसबुक पर हाल ही में स्टैनफोर्ड और न्यूयॉर्क यूनिवर्सिटी के प्रोफेसरों ने रिसर्च की। इसमें सामने आया कि जिन लोगों ने एक महीने या इससे ज्यादा समय के लिए फेसबुक छोड़ा, उनके भावनात्मक रवैये में काफी सकारात्मक बदलाव आया। हालांकि, लंबे समय के लिए फेसबुक छोड़ने की वजह से कई लोगों के सामान्य ज्ञान में कमी भी देखी गई। वैसे हमारे देश मे सामान्य ज्ञान फेसबुक से अपडेट नही होता अतः यहां के मामले में शायद यह पॉइंट लागू न हो। हाँ कई ऐसी खबरों से व्यक्ति वंचित हो सकता है जिनका अस्तित्व नही होता और जिसके बारे में कहा जाता है कि इसे मीडिया आपको नही दिखायेगा।
चलिए पहले रिपोर्ट का थोड़ा और अध्ययन कर लेते है। रिपोर्ट के मुताबिक, फेसबुक का इस्तेमाल बंद करने के बाद यूजर्स ने दूसरी सोशल मीडिया वेबसाइट पर जाना भी बंद कर दिया। इसके अलावा उनका राजनीतिक झुकाव भी किसी तरफ नहीं रहा। हालांकि सोशल मीडिया पर मौजूदगी कम होने की वजह से खबरों के बारे में उनकी जानकारी और समझ में कमी देखी गई।
स्टडी में सामने आया कि फेसबुक का इस्तेमाल बंद करने के बाद यूजर्स ने अपने परिवार को ज्यादा समय देना शुरू कर दिया। हालांकि, स्टडी का समय खत्म होने के बाद ज्यादातर लोगों ने अपना फेसबुक अकाउंट फिर से एक्टिवेट कर लिया। क्योकि लगभग लोग इसके आदी हो चुके थे।
वैसे इन साइट्स के कारण हम दो तीन चीजो से दूर जा रहे है। जैसे कि परिवार, किताबे, आपसी मेलजोल। अब हमारे कई क्रियाकलाप तो केवल इसलिए ही होते है कि उसे हम सोशल साइट पर डाल सके। जैसे कि पौधा लगाया, फोटो खिंचवाई ओर फेसबुक पर डाल दिया। शाम को चाहे उसे बकरी ही क्यो न खा जाए पर बन्दा कभी वापिस जाकर देखता नही है। लेकिन कुछ बाते अच्छी भी होती है जिससे लोग प्रेरणा लेते है, उनका अनुशरण करते है। इसलिए हम कह सकते है कि सीमित तथा प्रामाणिक उपयोग करे तो यह सोशल साइट्स बहुत अच्छी है। इससे हम न सिर्फ खबरों का आदान प्रदान कर सकते है बल्कि हमारे भाव भी इसके जरिये अखिल विश्व मे पहुंच सकते है। इसलिए प्रयोग भले ही कीजिये परन्तु सीमित मात्रा में उतना ही जितने में आप इसके आदी न बने।
सर्व आश्रयदात्री भारत माता की जय