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पलटवार कीजिए माओवादियों पर!

केंद्रीय गृहमंत्री पी.चिदम्बरम की कोलकाता बैठक से एक दिन पहले माओवादी-नक्सलियों ने झारखंड के गिरिडीह जिले में रेल लाइन का एक हिस्सा विस्फोट से उड़ा दिया। चिदम्बरम कोलकाता बैठक में उस रणनीति पर चर्चा करने वाले हैं, जिसे अपना कर माओवादियों को जवाब दिया जा सके। माओवादियों ने झारखंड, उड़ीसा, बिहार और पश्चिम बंगाल में ७२ घंटे बंद का आह्वान कर रखा है। बंद का आज तीसरा दिन था । कल माओवादियों ने बिहार में एक रेल लाइन उड़ा दी जिससे एक मालगाड़ी पटरी से उतर गई। इससे पहले, बंद के पहले दिन रविवार को वे उसी क्षेत्र में रेल लाइन उड़ा चुके हैं। झारखंड के एक सरकारी स्कूल की इमारत भी नक्सली धमाके में नष्ट हो चुकी है। माओवादी-नक्सली बंद का आह्वान, उनकी विध्वंसकारी हरकतें तथा मुख्यमंत्रियों के सम्मेलन में प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह तथा गृहमंत्री पी.चिदम्बरम के वक्तव्य इन सभी बातों को जोडक़र विचार करना होगा। प्रधानमंत्री डॉ.मनमोहन सिंह पिछले दो सालों में कम-से-कम तीन या चार बार माओवादी-नक्सली समस्या को देश की आंतरिक सुरक्षा के लिए गंभीर चुनौती निर्पित कर चुके हैं। शिवराज पाटिल के स्थान पर गृहमंत्री पद की जिम्मेदारी संभालने के बाद से चिदम्बरम ने अनेक अवसरों पर माओवादियों की गतिविधियों पर चिंता जताई है। कुछेक इलाकों में नक्सली-विरोधी अभियान शुरू किये जाने की जानकारी आती रही है। लेकिन माओवादियों के बुलंद हौसले और उनकी हमला रणनीति के आगे सरकार की ओर से किये गए उपाय बौने साबित हुए। प्रश्न यह है कि ''नक्सली समस्या एक गंभीर चुनौती है '' जैसा पहाड़ा यह देश कब तक सुनता रहेगा? पिछले दो सालों के दौरान माओवादियों-नक्सलियों और उनके सफेद पोश हमदर्दो को क्यों नहीं कुचला जा सका? लगभग दो सौ जिले नक्सली समस्या से प्रभावित हैं इनमें से आधे जिलों में इन लोगों ने सामानान्तर सरकार जैसी व्यवस्था बना ली है। उनके इलाके में पुलिस और प्रशासन तंत्र पंगु नजर आता है। अपने प्रभाव वाले इलाके में माओवादी-नक्सली जो चाहते हैं वह करते हैं। निर्माण ठेकों में वह दादागिरी टैवस लेते हैं। उनकी इच्छा के बिना पाक तक नहीं हिलता। उन्हें सुरक्षा बलों की गतिविधियों की पूर्ण जानकारी मिलने जैसी बातें सुनी गई हैं। वे ट्रेन रोक चुके हैं। पटरी उड़ा देना उनके लिए चुटकियों का काम है। कुल मिलाकर बड़ी गंभीर स्थिति है। यह बात समझ में नहीं आ रही है कि सीमा पार के षड्यंत्र, अंदर्नि गद्दारों की मदद से बढ़ रहा आतंकवाद का खतरा और माओवादी समस्या जैसी चुनौतियों पर सरकार आखिर कर क्या रही है? कई बार आशंका यह होती है कि समस्याओं और चुनौतियों का जाल इतना अधिक ड्डैल चुका है कि स्थिति कहीं बेकाबू न हो जाए। आखिर आप कितने मोर्चों पर लड़ोगे? सिफर् चिंता व्यक्त करने, रणनीति बनाने और उस पर विचार करने मात्र से क्या होगा? कुछ तो ठोस काम कीजिए। रेल लाइन उड़ाने वालों को बेधडक़ उड़ा देने का साहस दिखाना होगा। बिना झिझक और बिना संकोच के हर उस व्यक्ति पर वार हो जो राष्ट्र को किसी भी तरह से नुकसान पहुंचा रहा। कांग्रेस वैसे सॉफ्ट राजनीति के कारण बदनाम है। केंद्र में उसकी सरकार भी साफ्ट रवैये से ग्रस्त है। यह लटकाऊ-टरकाऊ रवैया देश के लिए खतरनाक हो सकता है।


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