समाचार विशेष
कॅर्नल स्लीमन और बाबा हरिदास
ठगों और पिंडारियों के आतंक से मुक्त कराने के लिए अंग्रेज शासकों ने एशिया के सर्वोष्ठ छह अफसरों में एक विलियम हेनरी स्लीमन को सन् १८३१ में सागर-नर्मदा संभाग का पोलिटिकल एजेंट बनाकर भेजा था। कॅर्नल ने ठगों व पिंडारियों के चंगुल से जनता को मुक्त कराने अपना कैम्प 'स्लीमनाबाद' के वर्तमान थाने में बनाया था और यही से उन्होंने व्यूह रचना कर ठगों व पिंडारियों से मुक्ति दिलाने की रणनीति को अमलीजामा पहनाया स्लीमन का विवाद १८२८ में जबलपुर में एमिली नामक अंग्रेज लडक़ी से हुआ। १८३२ तक शादी के चार वर्ष व्यतीत हो जाने पर कॅर्नल दम्पाि को कोई संतान नहीं हुई। इस बीच चिंतातुर मेडम एमिली ने स्लीमनाबाद के ग्रामीणजनों से कुहका के बाबा हरिदास के आश्रम की ख्याति सुनी, जहां पुत्र प्राप्ति की मनोकामना पूरी होती है। मादाम एमिली स्वामी हरिदार को कुहका स्थित आश्रम में पहुंची और उन्होंने बाबा के सामने मां बनने की अभिलाषा की पूर्ति की मनौती मांगी। प्रभुकृपा और स्वामी हरिदास जी के आशीर्वाद फलस्वरूप ६ जनवरी १८३३ को विलियम हेनरी स्लीमन ओर एमिली को सडक़ मार्ग से जलबपुर से सागर जाते समय गढक़ोटा के आसपास केम्प (पड़ाव) में प्रथम पुत्र रत्न की प्राप्ति हुई। इस पुत्र का नाम रखा गया हेनरी आर्थर। कॅर्नल ने सागर की तरफ कूच करने की बजाय अपने दल का मुंह पुनः वापिसी का कर दिया और वे स्लीमनाबाद के ही एक टोला (छोटी बस्ती) कुहका पहुंचकर मनौती की पूर्ति की दशा में श्रद्धा सुमन अर्पित करते है और एक पीतल की समाई लगभग ३/४ किग्रा वजन की बाबा को भेंट करते है। प्रथम पुत्र की प्राप्ति का बड़ा जश्न मनाया जाता है और आसपास के हजारों लोगों को भोजन पर आमंत्रित कर भोज दिया गया। घटना लगभग १६६ साल पुरानी है परंतु आज भी सैकड़ों वर्षों पूर्व की इस चमत्कारी घटना के प्रमाण स्वरूप स्व. कॅर्नल के मौजूदा वंशज इंग्लैण्ड से शादी विवाद या संतानोत्पाि के पश्चात भारत आकर स्लीमनाबाद पहुंचकर स्वामी हरिदासजी के आश्रम स्थल 'कुहका' आकार नतमस्तक होते हैं। कॅर्नल स्लीमन पहुंचकर स्वामी हरिदासजी के आश्रम स्थल कुहका आकर नमस्तक होते है। उन्होंने बाबा के आश्रम को मकाननुमा (खपरैल) स्वरूप प्रदान किया बाद में उसे बंगला कहा जाने लगा था। बाबा हरिदास कौन थे और उनका आश्रम कुहका में कैसे स्थापित हुआ इसका विवरण इस प्रकार है। जबलपुर से ९० किमी की दूरी पर कटनी है जो राष्ट्रीय राजमार्ग ७ मिर्जापुर रोड पर बसा पूर्व में तहसील मुख्यालय था अब जिला मुख्यालय बन चुका है। कटनी के आगे केन नदी के किनारे देवरी गांव है जो जंगल के किनारे देवरी गांव है जो जंगल के किनारे अहीर बहुल्ला आबादी का गांव था। पास के जंगल में एक महात्मा 'पर्ण कुटी' बनाकर रहते थे। देवरी गांव का अहीर बालक हरिया अपने ढोरो को चराने इसी जंगल में जाया करता था। संयोगवश एक दिन अहीर बालक हरिया अपने पशुओं को चराते-चराते सुनसान जंगल में उस स्थान पर पहुंच जाता है जहां महात्माजी कुटिया बनाकर रहते थे। दोपहर का समय था महात्मा जी भगवान का भोग लेकर बाहर आये थे और कुटिया के बाहर बालक को देखकर उसे प्रसाद थमा दिया। हरिया ने प्रसाद ग्रहण किया और फिर मगन हो गया अपने ढोरों के साथ। रात्रि में थका हारा हरिया दोपहर के वक्त बाबजी की कुटी के पास जाकर झाड़ ड्डूंस और पाी आदि की सफाई करने का क्रम सा बना लेता है। महात्मा और हरिया में एक अनाम रिश्ता सा कायम हो गया। एक दिन महात्मा ने हरिया से उसका काम, धाम और नाम पूछा तथा उसके परिवार के बारे में जानकारी ली। फिर कुछ समय व्यतीत हुआ तो हरिया ने महात्मा जी का मन जानकर उनसे अपने गांव देवरी चलने का आग्रह किया। महात्मा जी ने कहा कि वे कभी आयेंगे। और एक दिन वह अचानक अपने निश्चल अपढ़ भक्त हरिया के घर पहुंच गये। हरिया तो प्रसन्न हुआ ही परंतु उसके परिवार वालों ने भी भारी खुशी जाहिर करते हुए महात्मा जी का भाव विहल होकर स्वागत सत्कार किया। अपनी आवभगत और सेवा सुश्रूषा से प्रसन्न होकर महात्मा जी रात्रि में वापिस जंगल चले गये। ऐसा क्रम चलते-चलते बालक हरिया बालक से किशोर हो गया और चमत्कारिक रूप से हरिया के परिवार की माली हालत में सुधार होने लगा और तब महात्मा जी भी महीने में एकाधबार आने-जाने लगे। जब महात्मा जी देवरी गांव में हरिया के घर आकर ठहरते तो कमरे में कई दिनों तक अपने को बंद रखते थे। मकर संक्रञंति के एक दिन पूर्व महात्मा जी हरिया के घर पधारे और बोले की हरिया में अपना शरीर तुम्हारे घर छोडक़र २४ घंटे के लिए बाहर जा रहा हूं, तुम मेरे इस स्थूल शरीर की रखवाली करते रहना जब में वापिस आऊंगा तो सूक्ष्म से फिर इस स्थूल शरीर में प्रवेश कर लूंगा। हरिया ने महात्मा जी के प्रस्थान के बाद निर्जीव पड़े शरीर को सफेद कपड़े से ढंक दिया और कमरे में ताला लगा दिया। गांव के एक मालगुजार को कहीं से यह भनक मिल गई कि महात्मा का निर्जीत शरीर हरिया के कमरे में बंद है। जबसे हरिया के परिवार की हालत बेहतर हुई थी तभी से यह मालगुजार उन महात्मा जी से खार खाये बैठा था। मालगुजार ने हरिया के घर आकर ताव तुर्रा दिखाया ओर कहा कि यदि वह बंद कमरे का ताला नहीं खोलेगा तो वे पुलिस को सूचना दे देंगे? इस भय के कारण बेचारे हरिया ने ताल खोल दिया। कमरा जब खुला तो महात्मा जी बेजान शरीर वहां लेटा हुआ था। बस उस मालगुजार ने जोर जबरदस्ती महात्मा जी की शवयात्रा का बंदोबस्त किया और आनन फानन में दाह संस्कार कर उनके निर्जीव शरीर को अग्नि को समर्पित कर दिया। सन्यासी महात्माओं के शरीर को समाधि दी जाती है। अग्नि संस्कार वर्जित है। २४ घंटे समाप्त होते ही महात्माजी अपने सूक्ष्म शरीर में हरिया के घर लौटे और बोले हरिया मेरा शरीर कहां है? हरिया ने संपूर्ण घटना का वृतांत उन्हें बता दिया। महात्मा जी ने कहा कि अब मैं कहा जाऊं? भोले-भाले हरिया ने कहा कि अब आप मेरे ही शरीर में प्रवेश कर लीजिए । बस महात्मा जी की आत्मा प्रवेश हुई नहीं कि हरिया बोलचाल का तरीका बदल गया। वह अहीर अपढ़ बालक धर्म और आध्यात्म पर तर्क संगत ढंग से प्रवचन करने लगा। हरिया के इस बदले आचरण और उसके ज्ञात की चर्चा जब उस मालगुजार के कानों तक पहुंची जिसने महात्मा जी का शरीर जलवा दिया था तो वह हरिया को अपमानित करने उसके घर पहुंचा। इस पर हरिया ने कहा कि तूने मेरे शरीर को जला दिया परंतु मैंने उसे अनजाने में हुई गलती मानकार माफ कर दिया था परंतु अब मैं तेरा सर्वनाश कर दूंगा? और उसी रात्रि में उस कथित मालगुजार को घर में ऐसा भीषण अग्निकांड हुआ कि कोई भी जीवित प्राणी उस बखरी में बच नही सका। महात्मा के श्राप एवं मालगुजार के सर्वनाथ की घटना की खबर चहुंओर ड्डैल गई। कालांतर में हरिया की ख्याति दूरदराज तक पहुंची ओर अपनी समस्याओं के निदान हेतु लोग बाग 'बाबा' का आशीर्वाद लेने आने लगे। अब हरिया पूरी तरह महात्मा का सा जीवन जीने लगा था। एक दिन जब हरिया पर बाबा जी की आत्मा आई हुई थी तभी हरिया के बाप न महात्माजी को हाथ जोडक़र विनती की कि प्रभु यह आपका भक्तञ हरिया शादी शुदा है और यदि यह बाबा बन गया तो हमारे वंश की वृद्धि नहीं होगी, अतः कुञ्छ ऐसी कृञ्पा करते कि आपकी सेवा भी होती रहती और घर गृहस्थी भी चलती रहती? हरिया के शरीर में समाये महात्मा जी ने कहा कि तुम्हारा सोचना ठीक है। तुम एक काम करो एक चबूतरा बना दो और उसमें पीपल की सूखी लकड़ी जमीन में रोप दो जिस नि वह लकड़ी हरी हो जावे समझ लो मैने उसमें प्रवेश कर लिया है और वैसा ही करने पर जैसा बाबा ने कहा था कि एक दिन वाकई पीपल की सुखी डाली हरी भरी हो गई। महात्माजी ने परकाया प्रवेश के पूर्व शर्त रख दी थी कि पीपल में जाने के बाद हरिया प्रत्येक माह की पूर्णिमा ओर अमावश्या को बैठकी कर दीन दुःखियों और जरूरतमदों के दुख दरिद्र को दूर करने का प्रयत्न जीवन भर करेगा। और जब हरिया जीवित रहा उसने वैसा ही किया। आज भी इस गांव देवरी में वह पीपल की डाल विशाल वृक्ष बनकर फल-ड्डूल रहा है और इस गांव का नाम भी पीपल देवरी पड़ गया है। उपरोक्त गांव देवरी के यादवों की रिश्तेदारी (संबंध) कुहका गांव में थे सो कुहका, जो स्लीमनाबाद तिराहा से बमुश्किल एक किमी की दूरी का गांव है की यादव लोगों का देवरी में न सिफर् आना जाना था अपितु मकर संक्रञंति के आसपास आयोजित विशाल भंडारा में वे सपरिवार आते जाते और बाबा हरिदास की अरदास करते थे। एक बार जब पंडा को बाबा का भाव आया तो आदरपूर्वक कुहका के यादव लोगों ने प्रार्थना काफी कि उन्हें देवरी आने जाने में बड़ी तकलीफ होती है अतः यदि स्वामी जी अपना स्थान कुहका में बना लेने की अनुमति दे तो सभी को प्रसन्नता होगी और इस तरह उनकी प्रार्थना और भक्ति देखकर स्वामी जी ने स्वीकृति दे दी थी और माघ मास की बसंत पंचमी के दिनि यहां पधार गये और फिर प्रत्येक माह की पूर्णिमा और अमावस्या को यहां की बैठकी होती है। इसी कुहका के स्वामी हरिदास महाराज को आश्रम में सन् १८३२ में कर्नल विलियम हेनरी स्लीमन की पत्नी एमली स्लीमन ने मनौती मांगी थी।
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