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हॉकी विश्र्वकप के खिताब पर टिकी हैं भारत क
35 साल बाद पदक की आस नई दिल्ली । लंबे समय से किसी प्रतिष्ठित टूर्नामेंट में पदक के लिए तरस रही भारतीय राष्ट्रीय हॉकी टीम १२वें हॉकी विश्र्वकप में करीब ३५ साल बाद पदक जीतने के इरादे से मैदान पर उतरेगी। यह प्रतिष्ठित टूर्नामेंट दिल्ली में २८ फरवरी से १३ मार्च खेला जाएगा। भारतीय टीम ने शुर्आिती तीन विश्र्वकप टूर्नामेंट्स में अपनी छाप छोड़ते हुए शीर्ष तीन में जगह बनाई,लेकिन १९७५ विश्र्व कप में खिताबी जीत के बाद टीम को अब तक हुए आठ विश्र्व कप में पोडियम में खड़े होने का मौका नहीं मिला। स्पेन के बार्सिलोना में १९७१ में हुए प्रथम विश्र्व कप में टीम इंडिया सेमीफाइनल में पाकिस्तान से २-१ से हारने के बाद खिताब की दौड़ से बाहर हो गई थी, लेकिन तीसरे और चौथे स्थान के प्ले ऑॅफ में उसने केन्या को २-१ से मात देकर कांस्य पदक जीत लिया था। आठ बार की ओलंपिक चैंपियन भारतीय टीम १९७३ में हालैंड के एम्सटरडम में हुए विश्र्व कप में सेमीफाइनल की बाधा को पार करके फाइनल तक पहुंचने में सफल रही, लेकिन मेजबान हालैंड के खिलाफ अहम समय में बीपी गोविंदा के पेनल्टी स्ट्रोक से चूकने के बाद मुकाबला टाईब्रेकर में खिंचा जहां उसे एक बार फिर हार का मुंह देखना पड़ा। निर्धारित समय में मुकाबला दो-दो से बराबर रहने के बाद मैच अतिरिक्त समय लेकर खेला गया जहां अंतिम लम्हों में भारत को पेनल्टी स्ट्रोक मिला लेकिन गोविंदा चूक गए और मुकाबला टाईब्रेकर तक जा पहुंचा और भारत एक बार फिर ४-२ से हार गया। भारत एकमात्र बार १९७५ में मलेशिया के कुआलालंपुर में विश्र्व चैंपियन बना। एशियाई सरजमीं पर पहली बार हुए विश्र्व कप के फाइनल में भारत ने चिर-प्रतिद्वंद्वी पाकिस्तान को २-१ से मात देकर खिताब अपने नाम किया। भारतीय टीम ने इस टूर्नामेंट के दौरान सात मैचों में से पांच में जीत दर्ज की जबकि अर्जेन्टीना के खिलाफ उसे २-१ से टूर्नामेंट की एकमात्र हार का सामना करना पड़ा जबकि आस्ट्रेलिया के खिलाफ लीग मैच १-१ से बराबर रहा। भारतीय टीम हालांकि इसके बाद कभी सेमीफाइनल तक का सफर तय नहीं कर सकी जबकि १९८२ में अपनी मेजबानी में आयोजित विश्र्व कप के बाद १९९४ के अलावा हर बार टीम अंतिम पायदान पर आने से बचने के लिए ही जूझती नजर आई। अर्जेटीना के ब्यूनस आयर्स में वर्ष १९७८ में हुए विश्र्व कप में भारत छठे जबकि १९८२ में अपनी मेजबानी में मुंबई हुए विश्र्व कप में पांचवें पायदान पर रहा। अगला विश्र्व कप भारत के लिए किसी बुरे सपने से कम नहीं रहा और १९८६ में इंग्लैंड के विल्सडेन में आयोजित १२ टीमों के इस टूर्नामेंट में भारत जीत के लिए तरस गया और अपने सातों मैच हारने के बाद अंतिम पायदान पर रहा। पाकिस्तान (लाहौर) में १९९० में हुए विश्र्व कप में भी भारतीय टीम १२ टीमों के बीच १०वां स्थान ही ले पाई। इस दौरान उसने सात मैचों में से केवल एक प्ले ऑॅफ मैच जीता जबकि पांच मैचों में उसे शिकस्त मिली। इसके बाद सिडनी (आस्ट्रेलिया) में भारतीय टीम १२ टीमों के टूर्नामेंट में पांचवें स्थान पर रहते हुए किसी तरह अपनी प्रतिष्ठा बचाने में सफल रही। टीम ने सात में से चार मैच जीते जबकि दो में उसे हार का मुंह देखना पड़ा। लीग चरण में मिलीं इन दो हारों ने उसे सेमीफाइनल की दौड़ से बाहर कर दिया, लेकिन टीम इसके बाद दोनों मैच जीतकर पांचवां स्थान हासिल करने में कामयाब हो गई। भारत १९९८ में हालैंड में आयोजित विश्र्व कप में एक बार फिर शीर्ष स्थानों की दौड़ से बाहर होकर नौवें पायदान पर फिसल गया। भारतीय टीम लीग चरण में पांच में से चार मैच हारकर शीर्ष आठ की दौड़ में भी खुद को बरकरार नहीं रख पाई। कभी हाकी का सिरमौर रहने वाला भारत इसके बाद मलेशिया के बुकेत जलील में २००२ और जर्मनी के मोनशेंग्लाबाख में २००६ में आयोजित विश्र्व कप में भी क्रमशः १०वें और ११वें स्थान पर रहा और अब उसकी नजरें अपनी मेजबानी में होने वाले इस प्रतिष्ठित टूर्नामेंट के खिताब पर टिकी हुई हैं।
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