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सिर दर्द बने ठाकरे

मुंबई पुलिस का कहना है कि टीवी चैनल आईबीएन लोकमत के कार्यालय में हमला और वहां मौजूद सम्पादकीय विभाग के सदस्यों तथा कर्मचारियों के साथ मारपीट की घटना का सूत्रधार शिवसेना सांसद संजय राउत का छोटा भाई सुनील था। शिवसेना के मुखपत्र सामना की सम्पादकीय में कहा गया है कि यह कोई सुनियोजित हमला नहीं था। यह कुछ पत्रकारों के भ्रष्ट मस्तिष्क पर प्रहार था। शिवसेना प्रमुख बाल ठाकरे ने भी टीवी चैनल पर हमला करने वाले शिवसेना के गुण्डों का बचाव किया है। अतीत में अनेक अवसरों पर शिवसेना की इस तरह की गुण्डागर्दी सामने आने के दर्जनों प्रमाण हैं। महाराष्ट्र में शिवसेना और राज ठाकरे की महाराष्ट्र नव निर्माण सेना के बीच मराठी वोट बैंक पर कब्जे की लड़ाई के चलते दोनों ओर की क्षेत्रीय गुण्डागर्दी शायद इसी तरह चलती रहेगी। क्षेत्रीयता और भाषायी उन्माद भडक़ाने में राज ठाकरे शिवसेना से भी आगे निकल चुका है। महाराष्ट्र विधानसभा में समाजवादी पार्टी के सदस्य अबु आजमी पर मनसे के विधायकों द्वारा किया गया हमला हमारे संसदीय लोकतंत्र के इतिहास में काले धब्बे के रूप में दर्ज हो गया है। राज ठाकरे आए दिन कोई न कोई फरमान जारी करता रहता है और लोग दबे-सहमे उसकी गुण्डागर्दी बर्दाश्त करते जा रहे हैं। राज ठाकरे का दुस्साहस देखिये। गत दिवस उसने भारतीय स्टेट बैंक प्रबंधन से कहा कि महाराष्ट्र में बैंक के ११०० पदों पर सिर्ड्ड मराठियों को भर्ती किया जाए। फिर उसने बाम्बे स्टाक एक्सचेंज को फरमान सुना दिया। शेयरों आदि की जानकारी मराठी में भी दी जाए। किसी भारतीय भाषा में स्टाक एक्सचेंज से जुड़ी जानकारियां देने में कोई ऐतराज क्यों होगा? लेकिन राज ठाकरे की दादागिरी के आगे बाम्बे स्टाक एक्सचेंज ने जिस तरह पलक झपकते ही दुम दबा ली उससे बड़ा ही गलत संदेश गया। एक खास तरह गुंडागर्दी की राजनीति करने वालों के समक्ष इस तरह घुटने टेकना शर्मनाक है। मराठी भाषा और क्षेत्रीयता के नाम पर शिवसेना और मनसे की दादागिरी अब धैर्य की सीमा के टूटने की स्थिति को पार करने लगी है। वयोवृद्ध और वरिष्ठ पत्रकार एवं लेखक खुशवंत सिंह ने सही लिखा है। उनके अनुसार देश में सही सोच रखने वालों के लिए राज ठाकरे एक बड़ा सिरदर्द बन गया है। ''जो व्यक्ति राज्य विधानसभा में गुण्डागर्दी करवाने लगा, सरकारी और स्वशासी संस्थानों को आदेश जारी करने लगा हो उसके मस्तिष्क में भरे विध्वंसकारी विचारों का अनुमान लगाना कठिन नहीं है।'' कभी बाल ठाकरे ने लोगों के बीच घृणा पैदा करने में कसर नहीं छोड़ी थी। बरसों तक शिवसेना की गुण्डागर्दी को देश झेलता रहा। वही काम राज ठाकरे दोगुनी तेजी से आगे बढ़ा है। राज ठाकरे हो या बाल ठाकरे इनके दुस्साहस की वजह इनके कृत्यों पर समय रहते कड़ी कार्रवाई नहीं होना था। आईबीएन लोकमत चैनल पर हमला करने वालों को कानून के अनुसार अधिकतम कड़ी सजा सुनिश्चित की जानी चाहिए। बाल ठाकरे और राज ठाकरे को सीमा में रहने की हिदायत देनी होगी। वे कानून से ऊपर नहीं हैं। राज ठाकरे ने पिछले दो सालों में जितना नुकसान पहुंचाया है उसके बाद उसे सलाखों के पीछे भेजने की मांग उठने लगी है। शिवसेना और महाराष्ट्र नव निर्माण सेना से पूरी सख्ती से निबटने की जरूरत है।


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