वास्तुदोष दूर करने से लेकर यौनवर्धक दवाओं तक में होता है कछुए का प्रयोग, इस लिए बढ़ी तस्करी


पिछले कुछ सालों में उत्तर प्रदेश खास किस्म के कछुओं की तस्करी का केंद्र बन गया है। इन कछुओं की दुनिया भर में ऊंची कीमत पर तस्करी हो रही है।
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नई दिल्ली । पिछले कुछ सालों में उत्तर प्रदेश खास किस्म के कछुओं की तस्करी का केंद्र बन गया है। उत्तर प्रदेश से इन कछुओं की दुनिया भर में ऊंची कीमत पर तस्करी हो रही है। शुक्रवार को यूपी एसटीएफ ने ऐसे ही एक गिरोह के चार तस्करों को गिरफ्तार किया है। एसटीएफ के एसपी सत्यसेन यादव के अनुसार गिरफ्तार तस्करों के पास से से विशेष प्रजाति के 327 कछुए बरामद हुए हैं। बरामद कछुओं को स्पोडिड पोंड टर्टल या रेड सेंड टर्टल के नाम से जाना जाता है। ये कछुए जियोटलिनिस जीनस प्रजाति के हैं।

जो सामान्य रूप से दक्षिण भारत की नदियों में पाए जाते हैं, लेकिन उत्तर प्रदेश के इटावा के आसपास चंबल के करीब खेतों में भी ये बहुतायत मात्रा में पाए जाते हैं।

इस इलाके में चंबल, यमुना, सिंधु, क्वारी और पहुज जैसी अहम नदियों के अलावा छोटी नदियों और तालाबों में कछुओं की भरमार है। यहीं से इनकी तस्करी दुनिया भर में हो रही है। एसटीएफ द्वारा बरामद किए गए कछुए भी इटावा की बसेहर रेंज से तस्करी कर लाए गए थे, जिन्हें पश्चिम बंगाल भेजा जाना था। वहां से इन कछुओं को मेलिशाय, चीन, थाईलैंड, बैंकॉक समेत कई देशों में ऊंची कीमत पर तस्करी कर बेचा जाता है। आइए जानते हैं इन बेहद खूबसूरत और संरक्षित कछुओं की तस्करी का क्या उद्देश्य है। आपने बहुत से घरों, दुकान या अन्य प्रतिष्ठानों में छोटे से पानी के पात्र में चांदी या मार्बल का बना कछुआ रखा देखा होगा। इन्हें वास्तुशास्त्रियों की सलाह पर वास्तु दोष दूर करने और सुख समृद्धि के लिए रखा जाता है। इसकी जगह अब भारत समेत दुनिया के कई देशों में लोग घरों की खूबसूरती बढ़ाने और वास्तु दोष दूर करने के लिए कांच के बर्तन में असली कछुओं को पालने लगे हैं। बहुत से लोगों का मानना है कि घर में कछुआ रखने से धन यानि लक्ष्मी आती है। इस तरह की भ्रांतियां इन संरक्षितों जीवों की जान पर खतरा साबित हो रही हैं।

वन्य जीवों के संरक्षण के लिए काम करने वाली संस्था के डॉ. राजीव चौहान बताते हैं कि विदेशों में इन कछुओं की कीमत काफी ज्यादा होती है। भारत के कुछ राज्यों और कई देशों में इन कछुओं का इस्तेमाल यौनवर्धक के तौर पर भी होता है। इस वजह से इनकी मांग और बढ़ जाती है। पूर्वोत्तर भारत समेत कुछ राज्यों में कछुए का मांस खाने का भी चलन है, जो कि प्रतिबंधित है।

– ईएमएस