दुर्घटना में क्षतिग्रस्त हुए शरीर के अंगों को जस का तस बनाने का अभिनव प्रयोग


एक ही दिन में इस तकनीक से पैरालिसिस के मरीजों के हाथों के पंजों की मूवमेंट शरीर के अंदर तक के टूटे हुए अंगों की रिपेयरिंग कर दी जाती है।
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जालंधर। भीषण हादसों में शारीरिक अंगों को गंभीर क्षति पहुंचती है जिसके चलते लोगों को भारी परेशानी उठानी पड़ती है। वहीं कुछ बीमारियों के कारण भी कई अंग निष्क्रिय हो जाते हैं। जैसे पैरालिसिस, दुर्घटना में किसी के शारीरिक अंग को नुकसान पहुंचा हो। शरीर में कोई अंग डैमेज हो गया हो, इसका इलाज तो हमारे पास था, लेकिन डैमेज अंग को हूबहू बनाने की 3डी प्रिंटेड इंप्लांट तकनीक ने अब सब कुछ आसान कर दिया है।

खास बात है कि एक ही दिन में इस तकनीक से पैरालिसिस के मरीजों के हाथों के पंजों की मूवमेंट शरीर के अंदर तक के टूटे हुए अंगों की रिपेयरिंग कर दी जाती है। यह प्रयोग व तकनीक शारीरिक तौर पर कमजोर बच्चों के लिए भी उनके अंगों को सही करने में काफी मददगार साबित हो रही है। जालंधर की लवली प्रोफेशनल यूनिवर्सिटी (एलपीयू) में चल रही 106वीं साइंस कांग्रेस में काउंसिल ऑफ साइंटिफिक एंड इंडस्ट्रियल रिसर्च चंडीगढ़ ब्रांच सीआईआईओ के वैज्ञानिकों ने थ्री डी प्रिंटर आर्थोटिक्स व इंप्लांट तकनीक को विकसित किया है। प्रोजेक्ट लीडर डॉ. नीलेश कुमार ने बताया कि पहले पैरालिसिस के मरीजों के इलाज में दवाइयों के साथ-साथ फिजियोथेरेपी ही एकमात्र इलाज का साधन था।

इस तकनीक के बाद फिजियोथेरेपी का काम भी पूरा हो जाएगा। इस तकनीक से पीजीआई चंडीगढ़ व एम्स दिल्ली में मरीजों का इलाज शुरू भी कर दिया गया है। अभी पैरालिसिस के मरीजों के हाथ के पंजों को बनाने का प्रयोग पूरा हो गया है। इन थ्री डी प्रिंटेड तकनीक से ग्लव्स तैयार किया जाता है, जो पंजों की मूवमेंट को सही करता है। इसे अगले चरण में कलाई की मूवमेंट व उसके बाद अगले चरणों में शरीर के अन्य भागों की मूवमेंट के लिए प्रयोग किए जा रहा है। इसी प्रकार शरीर के किसी भी अंग के दुर्घटना में खराब हो जाने पर या टूट जाने पर इसी तकनीक से टाइटेनियम का उक्त भाग बनाकर अंग से जोड़ दिया जाता है। कुछ समय में उक्त अंग के साथ पूरी तरह से जुड़ जाता है। इसका प्रयोग शारीरिक तौर पर कमजोर किसी भी अंग को शक्तिशाली बनाने के लिए भी किया जा सकता है।

– ईएमएस