धर्मान्तरण से विकास एजेन्डा को लगेगा झटका


विनीत खरे

भारतीय जनता पार्टी के अध्यक्ष अमित शाह चाहे जितने दावे करें कि पार्टी का विकास एजेन्डा पटरी से नहीं उतर सकता है लेकिन वे देखते जाएं पार्टी का विकास एजेन्डा बुरी तरह से पटरी से उतर चुका है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इस स्थिति से भलि-भांति परिचित हैं। और वे देश की जनता की नब्ज पहचान कर धर्मान्तरण के मामलों और नेताओं द्वारा दिये जा रहे अनाप-शनाप बयानों पर खासे चिंतित हैं और अपनी नाराजी जाहिर कर चुके हैं।

आज पूरे देश का परिदृश्य बदल रहा है। भाजपा ने सत्ता में आते ही अच्छा माहौल बनाया था और यही कारण है कि राज्यों में हुए विधानसभा चुनाव में भाजपा को बढ़त मिली न केवल देश में बल्कि अन्तर्राष्ट्रीय मंचों पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने आप को विशेष नेता के रूप में स्थापित करने में सफलता पाई और आज वे विश्व के टॉप नेताओं की सूची में हैं। परन्तु बहुत चिंता का विषय है कि भारतीय जनता पार्टी की मातृ संस्था (राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ) तथा इससे जुड़े अनुषांगिक संगठन विश्व हिन्दू परिषद, धर्म जागरण मंच आदि पर भाजपा का जरा भी अंकुश नहीं है। वे स्वतंत्र हैं। और स्वछंद हैं। वे जो मन में आता है, करते हैं। उससे पूरे देश और विदेशों में भाजपा की क्या छवि बनेगी, इस पर विचार भी नहीं करना चाहते हैं।

आरएसएस और विश्व हिन्दू परिषद के नेता कट्टर हिन्दूवादी संगठन है और मौका मिलते ही घर वापसी के नाम पर आदिवासियों और अनुसूचित जाति के लोगों को जो ईसाई या मुस्लिम धर्म स्वीकार कर चुके थे उन्हें पुनः हिन्दू बनाने के लिए सुनियोजित तरीके से मुहिम चला रहे हैं। इस मुहिम का क्या असर होगा, सरकार पर दूसरा क्या प्रभाव पड़ेगा और अगले लोकसभा चुनाव तक भाजपा की लोकप्रियता कितनी घट जाएगी यह वे सोचना ही नहीं चाहते।

जहां तक सरकार का प्रश्न है वह बुरी तरह से विरोधी पार्टियों के निशाने पर हैं। काले धन का मामला सरकार के गले की फांस बन चुका है। क्योंकि विदेशी बैंकों से काला धन रखने वालों की सूची पाना और उसका विवरण प्राप्त कर लेना असंभव नहीं तो मुश्किल बहुत है। हालांकि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने काले धन के मुद्दे पर अन्तर्राष्ट्रीय समझ बनाने का प्रयत्व किया है और देशों को तैयार किया है कि वे इस मामले में ऐसे नियम कानून बनाएं जिससे भारत का ही नहीं अन्य देश भी अपने देश के काले धन को विदेशी बैंकों से वापस पा सवेंâ परंतु सम्मेलनों में बनी समझ अभी तक किसी कानून की शक्ल अख्तियार नहीं कर सकी। इस मुद्दे के अलावा भाजपा का शासनकाल अभी तक किसी के मुद्दे पर सफल नहीं हो पा रहा है जिसका हवाला देकर वह अगली बार लोकसभा चुनाव जीत सके।

धर्मान्तरण के मुद्दे से लोकसभा और राज्यसभा में विपक्ष द्वारा कार्यवाही नहीं चलने दी जा रही है वे बराबर मांग कर रहे हैं कि इस मुद्दे पर प्रधानमंत्री अपना वक्तव्य दें परंतु प्रधानमंत्री इस विषय पर बोलने की स्थिति में अपने आपको नहीं पा रहे हैं। इसीलिए वे वक्तव्य देने से बच रहे हैं। भाजपा के मंत्री जवाब देते हैं इस मुद्दे पर सरकार कठोर कानून बनाने के लिए तैयार है बशर्ते पूरा विपक्ष इसके लिए तैयार हो। परंतु कांग्रेस सहित अन्य पार्टियां नया कानून बनाने के पक्ष में नहीं है। उनका मानना है कि इससे संविधान में प्रदत्त नागरिकों के अधिकारों का हनन होगा। माक्र्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी ने धर्मान्तरण के मसले पर आरोप लगाते हुए कहा है कि धर्मांतरण के मामले पर एक अलग कानून बनाने की जरूरत नहीं है क्योंकि जबरन धर्मान्तरण पर रोक लगाने का प्रावधान भारतीय दंड संहिता में पहले से मौजूद है तथा आरएसएस, भाजपा जबरन धर्मान्तरण करवा रही है उन पर कानूनी कार्रवाई होनी चाहिए और कार्यक्रमों को प्रतिबंधित किया जाना चाहिए। संविधान के जानकार बतलाते हैं कि इसके अनुच्छेद २५ के अनुसार अन्तःकरण और धर्म को अबाध रूप से मानने, आचरण और प्रचार करने की स्वतंत्रता मुहैया कराता है। यदि कोई जबरन धर्मान्तरण किया जाता है तो भारतीय दंड विधान की धारा १५३ ए के तहत आता है। क्योंकि धर्म के नाम पर जबर्दस्ती को अपराध के दायरे में लाता है। आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत पर यही आरोप लग रहा है कि वे घर वापसी के नाम पर लोगों पर दबाव डालकर धर्मान्तरण करवा कर इसे स्वेच्छा का नाम दे रहे हैं।

धर्मान्तरण के मामले को धीरे धीरे देश की शांतिपूर्ण जनता विषाक्त मान रही है क्योंकि जिन्हें स्वेच्छा से धर्मान्तरण करना है उन्हें इसकी छूट है परंतु इसका इसका इतना हल्ला और वबंडर नहीं होता। आरएसएस और विश्व हिन्दू परिषद के नेता पहले भी आदिवासी अंचलों में धर्मान्तरण कराते रहे हैं। परंतु विपक्ष की सरकारों में वे मौन रहते थे। परन्तु अब जिस ढंग से वे आक्रामक हो रहे हैं वह देश की समग्र शांति व्यवस्था के लिए चिंतनीय पक्ष है जिसे हतोत्साहित किया जाना चाहिए। निश्चित रूप से धर्मान्तरण और विकास एंजेडा दो विपक्षी ध्रुव हैं जो कभी एक नहीं हो सकते जिसका खामियाजा भविष्य में भाजपा उठाएगी।