इलेक्ट्रानिक वोटिंग मशीन और चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली पर सवालिया


भारत में इलेक्ट्रानिक वोटिंग मशीन (ईवीएम) का उपयोग लगातार बढ़ रहा है। लोकसभा तथा विधानसभा चुनाव के बाद अब नगरीय तथा पंचायत स्तर के चुनावों में भी ईवीएम मशीनों का उपयोग शुरू हो गया है। मप्र राज्य निर्वाचन आयोग ने इस बार नगरीय चुनाव तथा जिला पंचायत अध्यक्ष एवं सदस्यों का चुनाव ईवीएम मशीनों से कराया जा रहा है। नगरीय चुनाव में ९ नगर निगमों में भाजपा उम्मीदवारों की विजय हुई है। उसके बाद राजनैतिक हल्कों में ईवीएम मशीनों को लेकर पुनः चर्चा शुरू हो गई है। विधानसभा चुनाव के दौरान भी कई विधानसभा क्षेत्रों के मतदान वेंâद्रों में डाले गए वोट से कम ज्यादा परिणाम मिलने तथा एक जगह उम्मीदवार के परिवार के सदस्यों के भी वोट पहले से वोटिंग मशीन से निकले तो उम्मीदवार ने आश्चर्य चकित होकर पिटीशन फाइल की है।
१९८२ से शुरू हुई भारत में वोटिंग मशीन
देश में पहली बार वोटिंग मशीन का उपयोग १९८२ में प्रायोगिक तौर पर शुरू हुआ था। चुनाव सुधार कार्यक्रम के तहत कुछ क्षेत्र विशेष में मशीनों का उपयोग चुनाव आयोग ने शुरू किया था।
१९८४ में सर्वोच्च न्यायालय ने चुनाव में इलेक्ट्रानिक वोटिंग मशीनों को अवैध करार दे दिया था। वेंâद्र सरकार ने आपी अधिनियम की धारा ६१अ को १९८९ में जोड़कर चुनाव आयोग की अनुमति और विवेक पर इलेक्ट्रानिक मशीनों के उपयोग का प्रावधान जोड़ा गया।
वेंâद्रीय चुनाव आयोग उक्त संशोधन के बाद लोकसभा एवं विधानसभा चुनावों में ईवीएम मशीनों के माध्यम से चुनाव कराने का क्षेत्र लगातार बढ़ाता रहा। पिछले ३० वर्षों में इसका दायरा निरंतर बढ़ता रहा। अब नगरीय तथा पंचायत चुनावों में भी ईवीएम के उपयोग होने से शक तथा विवादों का दायरा निरंतर बढ़ रहा है।
विकसित देशों ने ईवीएम मशीन को नकारा भारत ने अपनाया
दुनिया भर के विकसित राष्ट्रों जिसमें ब्रिटेन, प्रâांस, जर्मनी, जापान, सिंगापुर जैसे देशों ने इलेक्ट्रानिक वोटिंग मशीनों को नकार कर कागजों के मतपत्र पर चुनाव प्रणाली विकसित की। इन देशों ने ईवीएम मशीनों में छेड़छाड़ और गड़बड़ियों के कारण उन्हें चुनाव प्रक्रिया से बाहर कर दिया। भारत में विश्व के विकसित देशों यहां तक कि जहां ईवीएम मशीनों का उत्पादन होता है उस देश द्वारा भी चुनाव में उसका प्रयोग बंद कर दिया। उसके बाद भी भारत में इसका लगातार विस्तार होने से चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली पर भी संदेह और सवालिया निशान लगना शुरू हो गए हैं। सारी आशंकाओं तथा राजनैतिक दलों के विरोध के बाद भी चुनाव आयोग क्यों ईवीएम मशीन का उपयोग कर रहा है। इसको लेकर अटकलें भी लगना शुरू हो गई है।
ईवीएम मशीन सुरक्षित नहीं
भारत में सरकारी क्षेत्र की २ कम्पनियां बीईएल और ईसीआईएल ही चुनाव आयोग को ईवीएम मशीन सप्लाई करती है। विदेशी कम्पनियों से यह मशीनें और उनका साफ्टवेयर उक्त दोनों कम्पनी आयात करती हैं। इनका वास्तविक कोड भी चुनाव आयोग के पास उपलब्ध नहीं है। सुरक्षा कारणों का मुद्दा बनाकर मशीन सप्लाई करने वाली उक्त दोनों कम्पनियां चुनाव आयोग को सीव्रेâट कोड नहीं बताती है। जिसके कारण चुनाव आयोग और हाईकोर्ट भी मशीनों तथा साफ्टवेयर में की गई किसी छेड़छाड़ तथा गड़बड़ी का पता नहीं लगा सकती हैं। जिसके कारण चुनाव में ईवीएम मशीनों को अब शक की निगाहों से देखा जा रहा है।
ईवीएम मशीन का हार्डवेयर-साफ्टवेयर सुरक्षित नहीं
ईवीएम मशीन में छेड़छाड़ का खतरा साफ्टवेयर तथा हार्डवेयर में बदलाव कर आसानी से चुनाव परिणामों को नियंत्रित किया जा सकता है। मिशिगन विश्व विद्यालय के प्रोपेâसर डा. अलेक्स के अनुसार साफ्टवेयर में बदलाव कर नया साफ्टवेयर ईवीएम मशीन में डाला जा सकता है। वहीं हार्डवेयर में भी मामूली ५० से २०० रूपया कीमत की प्रोग्रामिंग चिप में बदलाव कर किसी भी स्तर पर चुनाव परिणामों को इच्छानुसार प्राप्त किया जा सकता है।
२००६ में ईवीएम मशीन सप्लाईकत्र्ता बैंगलोर की कम्पनी ने मशीन में एथीटिकेशन युनिट लगाकर सिक्योर स्पिन के लिए तैयार की थी। बाद में इसे बिना परीक्षण चुनाव आयोग के निर्देश पर हटा लिया गया। चुनाव आयोग के इस निर्णय पर प्रश्नचिन्ह भी लगे। विंâतु चुनाव आयोग के मौन और खौफ के चलते राजनैतिक दलों तथा कम्प्यूटर विशेषज्ञों ने भी चुप्पी साध ली थी।
मशीन को हेक करने तथा चिप बदलकर पूर्व निर्धारित परिणाम संभव
ईवीएम मशीन को कई तरीकों से हेक करके उनके परिणामों को बदला जा सकता है। इसी के कारण विकसित राष्ट्रों ने इनका एक या दो बार उपयोग कर गड़बड़ियों के कारण चुनाव में उपयोग बंद कर दिया था।
ईवीएम के कन्ट्रोल यूनिट में हिस्से होते हैं संरक्षित किया गया डाटा साफ्टवेयर तथा हार्डवेयर की सहायता तथा बाहरी सोर्स से डाटा पढ़ना और बदलना बहुत आसान है।
सबसे खतरनाक तरीका
कन्ट्रोल यूनिट के डिस्पले यूनिट में ट्रोगन रहित चिप लगाकर ईवीएम मशीन को बाहर से आसानी से हेक किया जा सकता है। इसे बदलने में मात्र दो मिनिट लगते हैं। मशीनों के रखरखाव के दौरान यह काम बड़ी आसानी से होता है। नई चिप पुरानी चिप तथा मशीन एवं साफ्टवेयर के सभी प्रोग्राम को बाईपास करते हुए वहीं परिणाम देती है जो हेकर चाहता है। कई देशों में इस तरह की गड़बड़ियों के सामने आने पर ईवीएम मशीन का उपयोग बंद कर दिया गया था। भारत का चुनाव आयोग सारे तथ्यों को जानते हुए भी ईवीएम मशीनों का उपयोग लगातार कर रहा है। जिसके कारण अब चुनाव आयोग की निष्पक्षता पर भी सवाल उठने लगे है
घपला और घोटाले की आंतरिक सांठगांठ
भारत में सरकारी क्षेत्र की दो कम्पनियां क्रमशः भारत इलेक्ट्रानिक निगम तथा इलेक्ट्रानिक्स कारपोरेशन आफ इंडिया ईवीएम मशीन सप्लाई करने का काम करती है। इन कम्पनियों का अस्तित्व चुनाव आयोग पर टिका हुआ है। सरकारी क्षेत्र की कम्पनी होने के कारण चुनाव आयोग वेंâद्र सरकार और राज्य सरकारें ईवीएम मशीनों को मनमाफिक पैसा कम्पनियों को देती है। विगत तीस वर्षों से उक्त दोनों कम्पनियां मशीनों एवं रखरखाव फीडिंग का काम कम्पनी विशेष से कराती है। यह दोनों कम्पनियां राजनेताओं और उद्योगपतियों की साझा निजी कम्पनियां है।
– चुनाव आयोग में अच्छी पीआर
ईवीएम मशीनों के सप्लाई करने वाली दोनों कम्पनियों के प्रतिनिधि चुनाव आयोग से ज्यादा से ज्यादा आदेश प्राप्त करने के लिए बेहतर रिलेशन विकसित करते है। बेहतर रिलेशन के लिए करोणों रूपयों का खर्चा उक्त कम्पनियां करती है। चुनाव आयोग में उन्हीं अधिकारियों की नियुक्ति होती है। जिनसे सरकार नाराज होती है। अब स्थिति तेजी से बदल रही है। चुनाव आयोग में वेंâद्र तथा राज्य सरकारें अब अपने विश्वास पात्र लोगों का चयन कर रही है। ईएमएम मशीनों की चमक से आयोग में जाने से अब अधिकारियों को भी परहेज नहीं रहा। चर्चाओं के अनुसार चुनाव आयोग में कार्यरत अधिकारियों के माध्यम से करोणों रूपया खर्चकर सरकारी क्षेत्र की उक्त दोनों कम्पनियां भारी कमाई कर रही है।
चुनाव आयोग का तकनीकि पर नियंत्रण नहीं
चुनाव आयोग ने तकनीकि सलाह के लिए एक कमेटी बनाई है। जिसके मुखिया कम्प्यूटर साइंस के प्रोपेâसर पी इंटर्सन है। इस कमेटी की बड़ी सीमित भूमिका है। मिशिगन में कम्प्यूटर साइंस के प्रोपेâसर डा. हेल्दर मेन ने ‘‘डेमोव्रेâसी एटरिस्क केन वी ट्रस्ट ओवर ईवीएम’’ नामक एक किताब लिखी है। जिसमें ईवीएम मशीन में किस तरह छेड़छाड़ कर परिणामों को बदला जा सकता है। इसका उल्लेख है। वेंâद्रीय निर्वाचन आयोग ने इस संबंध में परीक्षण एवं सतर्वâता बरतने के लिए निर्देश भी नहीं दिए जिससे चुनाव आयोग के निर्णयों पर प्रश्न चिन्ह लगना शुरू हो गए है।
चिप अलग मशीन अलग
मध्यप्रदेश चुनाव आयोग ने इस बार नगरीय चुनावों में जिन मशीनों का उपयोग किया है। उनमें मतदान के बाद चिप निकालकर उन्हें सील किया गया। मशीनों को पुनः दूसरे नगरीय चुनावों में नई चिप के साथ मशीनों का उपयोग किया गया।
इस प्रक्रिया में मूल यूनिट तथा चिप अलग हो गई। परिणामों के लिए चिप को नई मशीनों में डालकर परिणाम प्राप्त किए गए। इससे यदि कोई उम्मीदवार चुनाव के खिलाफ याचिका दायर करता है तो सिम के अतिरिक्त कोई रिकार्ड नहीं रहेगा। इसमें मशीन की सुरक्षा प्रणाली तथा चिप में गड़बड़ी पकड़ पाना ही संभव नहीं होगा। तकनीकि दृष्टि से यह सबसे बड़ी चूक है।
– चुनाव आयोग की मशीन सप्लायरों पर मेहरबानी
भारत के सभी प्रमुख राजनैतिक दलों ने २००९ में ईवीएम मशीनों के विरोध में चुनाव आयोग में आपत्ति दर्ज कराई थी। आपत्ति दर्ज कराने वालों में भाजपा, कांग्रेस, वामपंथीदल, तेलगू देशम पार्टी, अन्ना डीएमके, समाजवादी पार्टी, राष्ट्रीय लोकदल, जनता दल (यू) ने ईवीएम मशीन को असुरक्षित बताते हुए चुनाव में इनके प्रयोग नहीं करने की आपत्ति दर्ज कराई थी।
चुनाव आयोग ने इतने सारे राजनैतिक दलों के विरोध को दरकिनार करते हुए ना केवल ईवीएम मशीनों से चुनाव कराना जारी रखा वरन पिछले पांच वर्षों में अरबों रूपयों की ईवीएम मशीन तथा रखरखाव और प्रोग्रामिंग के लिए सरकारी तथा निजी क्षेत्र को चार कम्पनियों पर खर्च कराए। उल्लेखनीय है कि उक्त चारों कम्पनियों तथा स्याही सप्लाई करने वाली कम्पनी पर चुनाव आयोग की विशेष कृपा होने से यह प्रतिवर्ष अरबों रूपयों की कमाई करती है।