केवल महिलाएं ही नहीं पुरुष भी हो रहे प्रताड़ित, कानून पुरुषों के हक में नहीं


2015 में 65 हजार विवाहित पुरुषों ने की आत्महत्या

लखनऊ । कानपुर (पूर्वी) के पुलिस अधीक्षक सुरेंद्र दास का नौ सिंतबर को निधन हो गया। भारतीय पुलिस सेवा के 2014 बैच के अधिकारी सुरेंन्द्र दास ने पांच सितंबर को जहर खा लिया था। बताया जा रहा है कि घरेलू कलह के कारण उन्होंने आत्महत्या की है। पिछले साल इसी तरह से बिहार के आईएएस अधिकारी मुकेश कुमार ने पत्नी से विवाद के चलते गाजियाबाद रेलवे स्टेशन के पास ट्रेन से कटकर अपनी जान दे दी थी। सुरेंद्र दास और मुकेश कुमार देश की प्रशासनिक व्यवस्था के उन बड़े ओहदों पर थे,जहां पहुंचने के लिए लोग सर्वाधिक परिश्रम करते हैं। लेकिन सच यहीं है कि जो जितने ऊंचे पद पर बैठा होता है और जिसकी बाहरी दुनिया लोग क्या कहेंगे पर ज्यादा निर्भर होती है, वह व्यक्तिगत और मानसिक रूप से उतना ही कमजोर होता जाता है। इसकी एक और बड़ी वजह यह है कि आज भी यह मानकर चला जाता है कि पारिवारिक और वैवाहिक जीवन में केवल महिलाएं ही प्रताड़ित होती हैं। लेकिन आज के समाज में यह सच नहीं है।

इसी मानसिकता के चलते देश में जितने भी वैवाहिक कानूनों का विकास हुआ है, उसका जोर महिलाओं को न्याय दिलाने से ज्यादा इस बात पर रहा कि पुरुषों को बिना किसी सुनवाई का मौका दिए सामाजिक और कानूनी रूप से अपराधी बना दो। इन कानूनों के कारण ही घरेलू कलह या पति से झगड़ा होने पर पुरुषों को अंधेरा नजर आता है। किससे क्या कहें, कहां जाएं। नेशनल क्राइम रिकार्ड ब्यूरो 2015 के आंकड़ों के अनुसार इस साल करीब 65,000 विवाहित पुरुषों ने आत्महत्या की। इसके साथ ही देश में कुल आत्महत्या में से करीब एक तिहाई की वजह घरेलू कलह और वैवाहिक विवाद है। इस दौरान पुरुषों द्वारा की गई कुल आत्महत्याओं में से करीब 87 फीसदी 18 से 60 आयुवर्ग के पुरुषों द्वारा की गई है।

वैवाहिक और पारिवारिक जीवन में बढ़ते तनाव और कलह का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि जहां करीब एक दशक पहले एक हजार में मुश्किल से एक विवाहित जोड़ा तलाक के लिए कोर्ट जाता था, वहीं अब यह आंकड़ा प्रति हजार करीब 15 हो गया है। कारण जो भी हो, भारत में विवाह अब पारिवारिक पहलुओं से हटकर कानूनी पेचदगियों में फंसने लगा है। बड़े शहरों में हर महीने सैकड़ों की संख्या में तलाक के केस फाइल किए जाते हैं। देश में आज उन पुरुषों की संख्या लाखों में है, जो अपने वैवाहिक जीवन से दुखी हैं और तलाक लेने की मनोस्थिति से लगभग रोज गुजरते हैं। वह यह कदम नहीं उठा पाते क्योंकि उन्हें डर होता है कि उनका पक्ष सुने बिना ही उन्हें क्रूर करार दिया जाएगा।

इसके अलावा अगर कोई पुरुष बहुत ही अधिक प्रताड़ित होकर,किसी तरह से हिम्मत दिखाता भी है तो उस तुरंत आपराधिक प्रक्रिया संहिता की धारा 125 (भरण-पोषण), भारतीय दंड संहिता 498ए (पति और उसके नातेदारों के साथ क्रूरता),406 (अमानत में खयानत), हिंदू विवाह अधिनियम 1956 की धारा 24 (भरण-पोषण और वाद खर्च),घरेलू हिंसा अधिनियम 2005 के तहत अत्यधिक प्रताड़ना झेलनी पड़ती है और बिना किसी अपराध के मुकदमा लड़ने की सजा भुगतनी पड़ती है। हाल के वषों में न्यायपालिका ने 498ए और संबंधित धाराओं के दुरुपयोग को देखते हुए पुलिस और नीचे की अदालतों से पारिवारिक विवादों के मसले पर संवेदनशीलता बरतने के निर्देश दिए हैं। पिछले साल जस्टिस यू के गोयल और यू यू ललित ने राजेश शर्मा बनाम उत्तरप्रदेश सरकार के 498ए से जुड़े मामले के अपने फैसले में हर जिले में ‘परिवार कल्याण समिति’ गठित करने, हर क्षेत्र में एक विशेष जांच अधिकारी नियुक्त करने,जमानत की प्रक्रिया एक दिन में पूरी करने,परिवारजनों को व्यक्तिगत उपस्थिति के लिए मजबूर न करने तथा वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग से भी ट्रायल करने का निर्देश दिया है।